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पर्यायवाची शब्द/Paryayvachi Shabd (Synonyms Words)

पर्यायवाची शब्द/Paryayvachi Shabd (Synonyms Words)

 

पर्यायवाची शब्द/Paryayvachi Shabd (Synonyms Words)  :

पर्यायवाची शब्दों किसी भी भाषा की सबलता की बहुता को दर्शाता है। जिस भाषा में जितने अधिक पर्यायवाची शब्द होंगे, वह उतनी ही सबल व सशक्त भाषा होगी। इस दृष्टि से संस्कृत सर्वाधिक सम्पन्न भाषा है। कहा जाता है कि संस्कृत में ‘राजा’ शब्द के एक हजार से भी अधिक पर्यायवाची हैं। इसी प्रकार सारंग’ शब्द के पचास से ऊपर शब्द बन सकते हैं। भाषा में इन शब्दों के प्रयोग से पूर्ण अभिव्यक्ति की क्षमता आती है, साथ ही भाषा में वह आकर्षण और लालित्य आ जाता है जो कि वक्ता और श्रोता, दोनों के लिए ही अनिवार्य है। जिस भाषा में समानार्थक शब्दों का अभाव होगा उसमें अभिव्यक्ति का सौन्दर्य नहीं होगा और न वह पुनरुक्ति दोष से मुक्त हो पाएगी।

पर्याय का अर्थ है-समान। अतः समान अर्थ व्यक्त करने वाले शब्दों को पर्यायवाची शब्द (Synonym words) कहते हैं। इन्हें प्रतिशब्द या समानार्थक शब्द भी कहा जाता है। व्यवहार में पर्याय या पर्यायवाची शब्द ही अधिक प्रचलित हैं। अंग्रेजी व्याकरणकार Nesfield ने लिखा है- “A word having the same or nearly the same meaning as another.” अर्थात् वे शब्द जिनसे समान अथवा लगभग समान अर्थ का बोध होता है, पर्यायवाची शब्द कहलाते हैं। विद्यार्थियों के अध्ययन के लिए पर्यायवाची शब्दों की सूची प्रस्तुत है-

 



अंक – संख्या, गिनती, क्रमांक, निशान, चिह्न, छाप।

अंकमाल – अंकवार, आलिंगन, प्रेमालिंगन।

अंकुर – कोंपल, अँखुवा, कल्ला, नवोभिद्, कलिका, गाभ।

अंकुश – प्रतिबन्ध, रोक, दबाव, रुकावट, नियन्त्रण।

अंग – अवयव, अंश, कला, हिस्सा, भाग, खण्ड, उपांश, घटक, टुकड़ा।

अगाध – अथाह, गम्भीर, गहन, गहरा, असीम, अपार।

अग्नि – आग, अनल, पावक, जातवेद, कृशानु, वैश्वानर, हुताशन, रोहिताश्व, वायुसुख, हव्यवाहन।

अंचल – पल्लू, छोर, क्षेत्र, अंत, प्रदेश, आँचल, किनारा।

अचानक – अकस्मात, अनायास, एकाएक, दैवयोग।

अच्छा – उचित, उपयुक्त, ठीक, सही, बढ़िया, चोखा, बेहतर।

अजनबी – अपरिचित, अनजान, अज्ञात, गैर, नावाकिफ, अनभिज्ञ।

अटल – अडिग, स्थिर, पक्का, दृढ़, अचल, निश्चल।

अठखेली – कौतुक, क्रीड़ा, खेल-कूद, चुलबुलापन, उछल-कूद, हँसी-मजाक।

अमृत – अमिय, पीयूष, अमी, मधु, सोम, सुधा, सुरभोग।

अयोग्य – अनर्ह, योग्यताहीन, नालायक, नाकाबिल।

अर्थ – अभिप्राय, प्रयोजन, आशय, तात्पर्य, मतलब।

अर्जुन – भारत, गुडाकेश, पार्थ, सहस्रार्जुन, धनञ्जय।

अवज्ञा – अनादर, तिरस्कार, अवमानना, अपमान।

अश्व – घोड़ा, तुरंग, हय, बाजि, सैन्धव, घोटक, बछेड़ा।

असुर रजनीचर, निशाचर, दानव, दैत्य, राक्षस, दनुज, यातुधान।

अड़ेगा – रुकावट, विघ्न, अवरोध, व्यवधान।

अतिथि – मेहमान, पहुना, अभ्यागत, रिश्तेदार, नातेदार, आगन्तुका।

अतीत – पूर्वकाल, भूतकाल, विगत, गत।

अनाज – अन्न, शस्य, धान्य, गल्ला, खाद्यान्न।

अनाड़ी – अनजान, अनभिज्ञ, अज्ञानी, अकुशल, अदक्ष, अपटु, मूर्ख, अल्पज्ञ, नौसिखिया।

अनार – सुनील, वल्कफल, मणिबीज, बीदाना, दाड़िम, रामबीज, शुकप्रिय।

अनिष्ट – बुरा, अपकार, अहित, नुकसान, हानि, अमंगल।

अनुकम्पा – दया, कृपा, मेहरबानी।

अनुमान – अन्दाज, अटकल, कयास।

अनुरक्त – मग्न, व्यस्त, तल्लीन, आसक्त।

अनुपम – सुन्दर, अतुल, अपूर्व, अद्वितीय, अनोखा, अप्रतिम, अद्भुत, अनूठा।

अनुसरण – नकल, अनुकृत, अनुगमन।

अपमान – अनादर, उपेक्षा, निरादर, बेइज्जती।

अप्सरा – परी, देवकन्या, अरुणप्रिया, सुखवनिता, देवांगना, दिव्यांगना।

अभय – निडर, साहसी, निर्भीक, निर्भय, निश्चिन्त।

अभागा – बदनसीब, भाग्यहीन, बदकिस्मत, कर्महीन।

अभाव – कमी, तंगी, न्यूनता, अपूर्ति।

अभिजात – कुलीन, सुजात, खानदानी।

अभिप्राय – प्रयोजन, आशय, तात्पर्य, मतलब, अर्थ, मंतव्य, विचार।

अभिज्ञ – जानकार, विज्ञ, परिचित, ज्ञाता।।

अभिमान – गौरव, गर्व, नाज, घमंड, दर्प, स्वाभिमान।

अभियोग – दोषारोपण, कसूर, अपराध, गलती।

अभिलाषा – कामना, मनोरथ, इच्छा, आकांक्षा, ईहा, ईप्सा, चाह, लालसा, मनोकामना।

अभिवादन – नमस्ते, नमस्कार, प्रणाम, दण्डवत, राम-राम।

अभ्यास – रियाज, पुनरावृत्ति, दोहराना, मश्क।

अमर – मृत्युंजय, अविनाशी, अनश्वर, अक्षर, अक्षय।

अमीर – धनी, धनाढ्य, सम्पन्न, धनवान, पैसेवाला।

अशोक – ताम्रपल्लव, हेमपुष्पक, कर्णपूरक, पिण्डपुष्पक, रक्तपल्लव, अंगनाप्रिय।

अनन्त – असंख्य, अपरिमित, अगणित, बेशुमार।

अज्ञानी – अनभिज्ञ, अनजान, मूर्ख, मूढ, अबोध, नासमझा।

अगुआ – अग्रणी, सरदार, मुखिया, प्रधान, नायक।

अधर – रदन, छद, रदपुट, होंठ, ओष्ठ।

अध्यापक – आचार्य, शिक्षक, गुरु, व्याख्याता, अवबोधक, अनुदेशक।

अंधकार – तम, तिमिर, ध्वान्त, अंधियारा।

अनल – धूमकेतु, पावक, कृशानु, हुताशन, अग्नि, आग।

अघाना – छकना, तृप्त होना, सन्तुष्ट होना, पेट भरना।

अनुरूप – अनुकूल, संगत, अनुसार, मुआफिका।

अपकार – अनिष्ट, अमंगल, अहित, अनहित।

आतुर – बेचैन, अधीर, उद्विग्न, आकुल।

अनोखा – विलक्षण, अद्भुत, अनूठा, विचित्र।

अन्तःपुर – रनिवास, भोगपुर, जनानखाना हरम।

अदृश्य – अन्तर्धान, तिरोहित, ओझल, लुप्त।

अकाल – भुखमरी, कुकाल, दुष्काल, दुर्भिक्षा।

अशुद्ध – दूषित, गंदा, अपवित्र, अशुचि।

असभ्य – अभद्र, अविनीत, अशिष्ट, गॅवार, उजड्ड।

अभिप्राय – आशय, तात्पर्य, उद्देश्य, मंशा।

अनुपम – अतुल, अपूर्व, अप्रतिम, निरूपम, अद्वितीय, बेजोड़।

अधम – नीच, निकृष्ट, पतित।

अवज्ञा – तिरस्कार, अवहेलना, अवमान, तौहीन।

अतीत – विगत, व्यतीत, गत, गुजरा हुआ, बीता हुआ।

अनिश्चित – भ्रामक, संदिग्ध, अनिर्णीत।

अपकीर्ति – अपयश, बेदनामी, निंदा, अकीर्ति।

अध्ययन  – अनुशीलन, पारायण, पठनपाठन, पढ़ना।

अनुरोध – अभ्यर्थना, प्रार्थना, विनती, याचना, निवेदन।

अखण्ड – पूर्ण, समस्त, सम्पूर्ण, अविभक्त, समूचा, पूरा।

अपराधी – मुजरिम, दोषी, कसूरवार, सदोष।

अधीन – आश्रित, मातहत, निर्भर, पराश्रित, पराधीन।

अनुचित – नाजायज, गैरवाजिब, बेजा, अनुपयुक्त, अयुत।

अन्वेषण – अनुसन्धान, गवेषण, खोज, जाँच।

अनबन – विवाद, झगड़ा, तकरार, बखेड़ा।

अमूल्य – अनमोल, बहुमूल्य, मूल्यवान, बेशकीमती।

अवनति – अपकर्ष, गिराव, गिरावट, घटाव, ह्रास।

अश्लीलअभद्र, अधिभ्रष्ट, निर्लज्ज बेशर्म, असभ्य।

 



आकुल – व्यग्र, बेचैन, क्षुब्ध, बेकल।

आक्षेप – अभियोग, आरोप, दोषारोपण, इल्जाम।

आकृति – आकार, चेहरा-मोहरा, नैन-नक्श, डील-डौल।

आदर्श – प्रतिरूप, प्रतिमान, स्टैन्डर्ड, मानक।

आलसी – निठल्ला, बैठा-ठाला, ठलुआ, सुस्त, निकम्मा, काहिल।

आयुष्मान – चिरायु, दीर्घायु, शतायु, दीर्घजीवी।

आज्ञा – आदेश, निदेश, फरमान, हुक्म।

आश्रय – सहारा, आधार, भरोसा, अवलम्ब, प्रश्रय।

आख्यान – कहानी, वृत्तांत, कथा, किस्सा।

आधुनिक – अर्वाचीन, नूतन, नव्य, वर्तमानकालीन, नवीन, अधुनातन।

आवेग – तेजी, स्फूर्ति, जोश, त्वरा, तीव्र, फुर्ती, चपलता।

आलोचना समीक्षा, टीका, टिप्पणी, नुक्ताचीनी, समालोचना।

आरम्भ – श्रीगणेश, शुरूआत, सूत्रपात, उपक्रम।

आवश्यक – अनिवार्य, अपरिहार्य, जरूरी, बाध्यकारी।

आदि – पहला, प्रथम, आरम्भिक, आदिम।

आचरण – व्यवहार, बरताव, सदाचार, शिष्टाचार।

आपत्ति – विपदा, मुसीबत, आपदा, विपत्ति।

अरण्य – जंगल, कान्तार, विपिन, वन, कानन।

आकाश – नभ, अम्बर, अन्तरिक्ष, आसमान, व्योम, गगन, दिव, द्यौ, पुष्कर, शून्य।

आचरण – चाल-चलन, चरित्र, व्यवहार, आदत, बर्ताव।

आडम्बर – पाखण्ड, ढकोसला, ढोंग, प्रपंच, दिखावा।

आँख – अक्षि, नयन, नेत्र, लोचन, दृग, चक्षु।

आँगन – प्रांगण, बगड़, बाखर, अजिर, अँगना, सहन।

आम – रसाल, आम्र, फलराज, पिकबन्धु, सहकार, अमृतफल।

आनन्द – आमोद, प्रमोद, विनोद, उल्लास, प्रसन्नता, सुख, हर्ष।

आराम – विश्राम, चैन, राहत, विश्रान्ति, शान्ति।

आशा – उम्मीद, तवक्को, आस।

आशीर्वाद – आशीष, दुआ, शुभाशीष, शुभकामना।

आश्चर्य – अचम्भा, अचरज, विस्मय, ताज्जुब।

आहार – भोजन, खुराक, खाना, भक्ष्य, भोज्य।

आस्था – विश्वास, श्रद्धा, मान, ‘कदर, महत्त्व, आदर।

 



इन्दिरा – लक्ष्मी, रमा, श्री, कमला।

इच्छा – लालसा, कामना, चाह, मनोरथ, ईहा, ईप्सा, आकांक्षा, अभिलाषा, मनोकामना।

इन्द्र – महेन्द्र, सुरेन्द्र, सुरेश, पुरन्दर, देवराज, मधवा, पाकरिपु, पाकशासन, पुरहूत।

इन्द्राणी – शची, इन्द्रवधू, महेन्द्री, इन्द्रा, पौलोमी, शतावरी, पुलोमजा।

इन्कार – अस्वीकृति, निषेध, प्रत्याख्यान।

इच्छुक अमिलाषी, लालायित, उत्कण्ठित, आतुर।

इशारा – संकेत, इंगित, निर्देश।

इन्द्रधनुष – सुरचाप, इन्द्रधनु, शक्रचाप, सप्तवर्णधनु।

 



ईख – गन्ना, ऊख, रसडंड, रसाल, पेंड़ी, रसद।

ईमानदार – सच्चा, निष्कपट, सत्यनिष्ठ, सत्यपरायण।

ईश्वर – परमात्मा, परमेश्वर, ईश, ओम, ब्रह्म, अलख, अनादि, अज, अगोचर, जगदीश।

ईर्ष्या – मत्सर, डाह, जलन, कुढ़ना

 



उचित – ठीक, सम्यक्, सही, उपयुक्त।

उत्कर्ष – उन्नति, उत्थान, अभ्युदय, उन्मेष।

उत्पत्ति – पैदाइश, उद्भव, जन्म।

उत्पात – दंगा, उपद्रव, फसाद, हड़दंग, गड़बड़।

उत्सव – समारोह, आयोजन, पर्व, त्योहार।

उत्साह – जोश, उमंग, हौसला, उत्तेजना।

उत्सुक – आतुर, उत्कण्ठित, व्यग्र, उत्कर्ण, रुचि, रुझान।

उदार – सदय, उदात्त, सहृदय।

उदास – उन्मन, विमनस्क, खिन्न।

उदाहरण – मिसाल, नमूना, दृष्टान्त।

उद्देश्य – प्रयोजन, ध्येय, लक्ष्य।

उद्यत – तैयार, प्रस्तुत, तत्पर।

उन्मूलन – निरसन, अन्त, उत्सादन।

उपकार – परोपकार, अच्छाई, भलाई, नेकी, हित, उद्धार, कल्याण।

उपस्थित – विद्यमान, हाजिर, प्रस्तुत।

उत्कृष्ट – उत्तम, श्रेष्ठ, प्रकृष्ट, प्रवर।

उत्थान – उत्कर्ष, उठान, उत्क्रमण, चढ़ाव, आरोह।

उल्लास – हर्ष, आनन्द, प्रमोद, आह्लाद।

उपमा – तुलना, मिलान, सादृश्य, समानता।

उपासना – पूजा, आराधना, अर्चना, सेवा।

उदासीन – विरक्त, निर्लिप्त, अनासक्त, वीतराग।

उद्यम – परिश्रम, पुरुषार्थ, श्रम, मेहनत।

उजाला – प्रकाश, आलोक, प्रभा, ज्योति।

उद्धार – मुक्ति, निस्तार, अपमोचन, छुटकारा।

उलझन – असमंजस, दुविधा, अनिश्चय, संभ्रम।

उपाय – युक्ति, ढंग, तरकीब, तरीका।

उपयुक्त – उचित, ठीक, वाजिब, मुनासिब, वाँछनीय।

उपेक्षा – उदासीनता, विरक्ति, अनासक्ति, विराग।

उल्टा – प्रतिकूल, विलोम, विपरीत, विरुद्ध।

उजाड़ – निर्जन, वीरान, सुनसान, बियावान्।

उग्र – तेज, प्रबल, प्रचण्ड।

उपहार भेंट, सौगात, तोहफा।

उपालम्भ – उलाहना, शिकवा, शिकायत।

उल्लंघन – तिरस्कार, उपेक्षा, अवज्ञा।

उल्लू उलूक, लक्ष्मीवाहन, कौशिक।

 



ऊँचा – उच्च, शीर्षस्थ, उन्नत, उत्तुंग।

ऊर्जा – ओज, स्फूर्ति, शक्ति।

ऊसर – अनुर्वर, सस्यहीन, अनुपजाऊ, रेत, रेह।

ऊष्मा – उष्णता, तपन, ताप, गर्मी।

 



ऋषि – मुनि, मनीषी, महात्मा, साधु, सन्त।

ऋद्धि बढ़ती, बढ़ोतरी, वृद्धि, सम्पन्नता, समृद्धि

 



एकता – एका, सहमति, एकत्व।

एहसान – आभार, कृतज्ञता, अनुग्रह।

 



ऐश – विलास, ऐयाशी, सुख-चैन।

ऐश्वर्य – वैभव, प्रभुता, सम्पन्नता, समृद्धि।

ऐच्छिक – स्वेच्छाकृत, वैकल्पिक, अख्तियारी।

 



दम, जोर, पराक्रम, बल, शक्ति, ताकत।

ओझल – अंतर्धान, तिरोहित, अदृश्य।

 



और – (i) अन्य, दूसरा, इतर, भिन्न (ii) अधिक, ज्यादा (ii) एवं, तथा।

औषधि – दवा, दवाई, भेषज।

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अव्यय/Avyay (Indeclinables) और उसके प्रकार

अव्यय_Avyay (Indeclinables)

अव्यय/Avyay (Indeclinables) परिभाषा :

ऐसे शब्द जिनमें लिंग, वचन, पुरुष, कारक आदि के कारण कोई विकार नहीं आता, अव्यय/Avyay कहलाते हैं।

ये शब्द सदैव अपरिवर्तित, अविकारी एवं अव्यय/Avyay रहते हैं। इनका मूल रूप स्थिर रहता है, कभी बदलता नहीं ।

अव्यय /Avyay का शाब्दिक अर्थ है – ‘अ + व्यय’; जो व्यय न हो उसे अव्यय कहते हैं, इसे अविकारी शब्द भी कहते हैं क्योंकि इसमें किसी प्रकार का विकार नहीं हो सकता, ये सदैव समान रहते हैं। संस्कृत में इसे इस प्रकार पारिभाषित किया गया है –

सदृशं त्रिषु लिंगेषु सर्वाषु च विभक्तिषु।

वचनेषु च सर्वेषु यन्नं व्ययति तदव्ययम्।।

अर्थात् जो तीनों लिंगों में, सभी विभक्तियों में और सभी वचनों में समान रहे और जिसका व्यय न होता हो, उसे ‘अव्यय’/Avyay कहते हैं।

जैसे — आज, कब, इधर, किन्तु, परन्तु, क्यों, जब, तब, और, अतः, इसलिए आदि ।

अव्यय/Avyay के भेद :

अव्यय/Avyay के चार भेद बताए गए हैं :

  • क्रिया विशेषण (Adverb)

  • सम्बन्धबोधक, (Post Position)

  • समुच्चयबोधक, (Conjunction)

  • विस्मयादिबोधक (Interjection)

(1) क्रिया विशेषण :

जो शब्द  क्रिया की विशेषता बतलाते हैं, उन्हें क्रिया विशेषण कहा जाता है। क्रिया विशेषण को अविकारी विशेषण भी कहते हैं; जैसे धीरे चलो। वाक्य में ‘धीरे’ शब्द ‘चलो क्रिया की विशेषता बतलाता है अतः ‘धीरे’ शब्द क्रिया विशेषण है। इसके अतिरिक्त क्रिया विशेषण दूसरे क्रिया विशेषण की भी विशेषता बताता है; जैसे वह बहुत धीरे चलता है। इस वाक्य में बहुत’ क्रिया विशेषण और यह दूसरे क्रिया विशेषण ‘धीरे’ की विशेषता बतलाता है।

अर्थ के आधार पर क्रिया विशेषण चार प्रकार के होते हैं :

  • कालवाचक (Adverb of Time)

  • स्थानवाचक (Adverb of Place)

  • परिमाणवाचक (Adverb of Quantity)

  • रीतिवाचक (Adverb of Manner)

  1. स्थानवाचक (Adverb of Place) : जिन शब्दों से क्रिया में स्थान सम्बन्धी विशेषता प्रकट हो, उन्हें स्थानवाचक क्रिया विशेषण कहते हैं;

 

स्थितिवाचकयहाँ, वहाँ, भीतर, बाहर।
दिशावाचकइधर, उधर, दाएं, बाएं।

 

  1. कालवाचक (Adverb of Time) : जिन शब्दों से क्रिया में समय सम्बन्धी विशेषता प्रकट हो, उन्हें कालवाचक क्रिया विशेषण कहते हैं;

 

समयवाचकआज, कल, अभी, तुरन्त
अवधिवाचकरात भर, दिन भर, आजकल, नित्य
बारंबारतावाचकहर बार, कई बार, प्रतिदिन

 

  1. परिमाणवाचक (Adverb of Quantity) : जिन शब्दों से क्रिया का परिमाण (नाप-तौल) सम्बन्धी विशेषता प्रकट होती है उन्हें परिमाणवाचक क्रिया विशेषण कहते हैं;

 

अधिकताबोधकबहुत, खूब, अत्यन्त, अति
न्यूनताबोधकजरा, थोड़ा, किंचित्, कुछ।
पर्याप्तिबोधकबस, यथेष्ट, काफी, ठीक
तुलनाबोधककम, अधिक, इतना, उतना
श्रेणीबोधकबारी-बारी, तिल-तिल, थोड़ा-थोड़ा

 

  1. रीतिवाचक (Adverb of manner): जिन शब्दों से क्रिया की रीति सम्बन्धी विशेषता प्रकट होती है उन्हें रीतिवाचक क्रिया विशेषण कहते हैं। जैसे – ऐसे, वैसे, कैसे, धीरे, अचानक, कदाचित्, अवश्य, इसलिए, तक, सा, तो, हाँ, जी, यथासम्भव।

रीतिवाचक क्रिया विशेषणों की संख्या बहुत बड़ी है। जिन क्रिया विशेषणों का सामवेश दसरे वर्गों में नहीं हो सकता, उनकी गणना इसी में की जाती है। रीतिवाचक या क्रिया विशेषण को निम्नलिखित भागों में बाँटा जा सकता है –

 

प्रकारऐसे, कैसे, वैसे, मानों, अचानक, धीरे-धीरे स्वयं, परस्पर, ” आपस में, यथाशक्ति, फटाफट, झटपट, आप ही आप इत्यादि।
निश्चयनि:सन्देह, अवश्य, बेशक, सही, सचमुच, जरूर, अलबत्ता, दरअसल, यथार्थ में, वस्तुतः इत्यादि
अनिश्चयकदाचित्, शायद, सम्भव है, हो सकता है, प्रायः यथासम्भव इत्यादि।
स्वीकारहाँ, हाँ जी, ठीक, सच आदि।
निषेधन, नहीं, गलत, मत, झठ आदि।
कारणइसलिए, क्यों, काहे को आदि।
अवधारणतो, ही, भी, मात्र, भर, तक, आदि।

 

(2) सम्बन्धबोधक:

जो अव्यय किसी संज्ञा के बाद आकर उस संज्ञा का संबंध वाक्य के दूसरे शब्द से दिखाते हैं, उन्हें संबंध बोधक कहते हैं। जैसे –

  1. वह दिन भर काम करता रहा।
  2. मैं विद्यालय तक गया था।
  3. मनुष्य पानी के बिना जीवित नहीं रह सकता।

सम्बन्धबोधक अव्ययों के कुछ और उदाहरण निम्नवत् हैं –

अपेक्षा, समान, बाहर, भीतर, पूर्व, पहले, आगे, पीछे, संग, सहित, बदले, सहारे, आसपास, भरोसे, मात्र, पर्यन्त, भर, तक, सामने ।

सम्बन्धबोधक अव्ययों का वर्गीकरण तीन आधारों पर किया गया है

(क) प्रयोग के आधार पर

(ख) अर्थ के आधार पर

(ग) रूप या व्युत्पत्ति के आधार पर

(क) प्रयोग के आधार पर सम्बन्धबोधक अव्यय का प्रयोग तीन प्रकार से होता है।

  1. विभक्ति सहित : जिन अव्यय शब्दों का प्रयोग कारक विभक्तियों (ने, को, से आदि) के साथ होता है उन्हें विभक्ति सहित सम्बन्धबोधक अव्यय कहते हैं; जैसे—यथा, पास, लिए आदि।
  2. विभक्ति रहित : जिस अव्यय का प्रयोग बिना कारक विभक्तियों के होता है उसे विभक्ति रहित सम्बन्धबोधक अव्यय कहते हैं; | जैसे—रहित, सहित आदि।
  3. उभयविधि : जिस अव्यय का प्रयोग विभक्ति सहित और विभक्ति रहित दोनों प्रकार से होता है, उसे उभयविधि सम्बन्धबोधक कहते हैं; जैसे—द्वारा, बिना आदि।

(ख) अर्थ के आधार पर अर्थ के आधार पर अव्यय आठ प्रकार के होते हैं।

कालवाचक, स्थानवाचक, दिशावाचक, साधनवाचक, कारणवाचक, सादृश्यवाचक, विरोधवाचक, सीमावाचक।

  1. कालवाचक : जिन अव्यय शब्दों से ‘समय’ का बोध होता है, उन्हें कालवाचक सम्बन्धबोधक अव्यय’ कहते हैं; जैसे-आगे, पीछे, बाद में, पश्चात्, उपरान्त इत्यादि।
  2. स्थानवाचक : जिन अव्यय शब्दों से स्थान का बोध हो उन्हें स्थानवाचक सम्बन्धबोधक अव्यय कहते हैं; जैसे-आगे, पीछे, ऊपर, नीचे, सामने, निकट, भीतर इत्यादि।
  3. दिशावाचक : जिन अव्यय शब्दों से किसी ‘दिशा’ का बोध होता है, दिशावाचक सम्बन्धबोधक अव्यय कहते हैं; जैसे-ओर, तरफ, आसपास, प्रति, आर-पार इत्यादि।
  4. साधनवाचक : जिन अव्यय शब्दों से किसी साधन’ का बोध होता है, उन्हें साधनवाचक सम्बन्धबोधक अव्यय कहते हैं। जैसे–माध्यम, मार्फत, द्वारा, सहारे, जरिए इत्यादि।
  5. कारणवाचक : जिन अव्यय शब्दों से किसी कारण’ का बोध होता है, उन्हें कारणवाचक सम्बन्धबोधक अव्यय कहते हैं; जैसे—कारण, तु, वास्ते, निमित्त, खातिर इत्यादि।
  6. सादृश्यवाचक : जिन अव्यय शब्दों से ‘समानता’ का बोध होता है, उन्हें सादृश्यवाचक सम्बन्धबोधक अव्यय कहते हैं; जैसे—समान, तरह, जैसा, वैसा ही आदि।
  7. विरोधवाचक : जिन अव्यय शब्दों से प्रतिकूलता या विरोध का बोध होता है, उन्हें विरोधवाचक सम्बन्धबोधक अव्यय कहते हैं; जैसे—विरुङ, प्रतिकूल, विपरीत, उल्टा इत्यादि।
  8. सीमावाचक : जिन अव्यय शब्दों से किसी सीमा’ का पता चलता है, उन्हें सीमावाचक सम्बन्धबोधक अव्यय कहते हैं; जैसे—तक, पर्यन्त, भर, मात्र आदि।

(ग) व्युत्पत्ति या रूप के आधार पर रूप अथवा व्युत्पत्ति के आधार पर सम्बन्धबोधक अव्यय दो प्रकार के होते हैं –

  1. मूल सम्बन्धबोधक

  2. यौगिक सम्बन्धबोधक

मूल सम्बन्धबोधक : जो अव्यय किसी दूसरे शब्द के योग से नहीं बनते बल्कि अपने मूलरूप में ही रहते हैं उन्हें मृल सम्बन्धबोधक अव्यय कहत है; जैसे—बिना, समेत, तक आदि।

यौगिक सम्बन्धबोधक : जो अव्यय संज्ञा, विशेषण, क्रिया आदि के योग से बनते हैं, उन्हें यौगिक सम्बन्धबोधक अव्यय कहते हैं; जैसे—पर्यन्त (परि + अन्त)।

(3) समुच्चयबोधक :

दो वाक्यों को परस्पर जोड़ने वाले शब्द समुच्चयबोधक अव्यय कहे जाते हैं। जैसे :

सूरज निकला और पक्षी बोलने लगे।

यहां ‘और समुच्चयबोधक अव्यय है।

समुच्चयबोधक अव्यय मूलतः दो प्रकार के होते हैं :

  • समानाधिकरण

  • व्यधिकरण

पुनः समानाधिकरण समुच्चयबोधक के चार उपभेद हैं :

संयोजकऔर, एवं, तथा
विभाजकया, अथवा, किंवा, नहीं तो।
विरोध दर्शकपर, परन्तु, लेकिन, किन्तु, मगर, वरन्
परिणाम-दर्शकइसलिए, अतः, अतएव

 

व्यधिकरण समुच्चयबोधक के भी चार उपभेद हैं :

कारणवाचकक्योंकि, जोकि, इसलिए कि
उद्देश्यवाचककि, जो, ताकि
संकेतवाचकजो….तो, यदि….तो, यद्यपि….तथापि
स्वरूपवाचककि, जो, अर्थात्, यानी

 

(4) विस्मयादि बोधक :

जिन अव्ययों से हर्ष, शोक, घृणा, आदि भाव व्यंजित होते हैं तथा जिनका संबंध वाक्य के किसी पद से नहीं होता, उन्हें विस्मयादिबोधक अव्यय कहते हैं, जैसे –

हाय ! वह चल बसा ।।

इस अव्यय के निम्न उपभेद है :

हर्षबोधकवाह, आह, धन्य, शाबाश
शोकबोधकहाय, आह, त्राहि-त्राहि
आश्चर्यबोधकऐं, क्या, ओहो, हैं
स्वीकारबोधकहाँ, जी हाँ, अच्छा, जी, ठीक।
अनुमोदनबोधकठीक, अच्छा, हाँ-हाँ।
तिरस्कारबोधकछिः, हट, धिक, दूर।
सम्बोधनबोधकअरे, रे, जी, हे, अहो

 

निपात : मूलतः निपात का प्रयोग अव्ययों के लिए होता है। इनका कोई लिंग, वचन नहीं होता। निपातों का प्रयोग निश्चित शब्द या पूरे वाक्य को श्रव्य भावार्थ प्रदान करने के लिए होता है। निपात सहायक शब्द होते हुए भी वाक्य के अंग नहीं होते। निपात का कार्य शब्द समूह को बल प्रदान करना भी है। निपात कई प्रकार के होते हैं। जैसे –

स्वीकृतिबोधकहाँ, जी, जी हाँ।
नकारबोधकजी नहीं, नहीं ।
निषेधात्मकमत
प्रश्नबोधकक्या
विस्मयबोधककाश
तुलनाबोधकसा
अवधारणाबोधकठीक, करीब, लगभग, तकरीबन
आदरबोधकजी

अव्यय का पद परिचय (Parsing of Indeclinables):

वाक्य में अव्यय का पद परिचय देने के लिए अव्यय, उसका भेद, उससे संबंध रखने वाला पद—इतनी बातों का उल्लेख करना चाहिए। जैसे –

वह धीरे-धीरे चलता है।

धीरे-धीरे-अव्यय, क्रिया विशेषण, रीतिवाचक, किस की विशेषता बताने वाला।

 

 

Hindi

क्रिया/Verb/Kriya और उसके भेद

क्रिया/kriya/verb और उसके भेद

क्रिया /Kriya(Verb) परिभाषा :

जिस शब्द से किसी कार्य का होना या करना समझा जाय, उसे क्रिया /Kriya(Verb)कहते हैं। जैसे-खाना, पीना, पढ़ना, सोना, रहना, जाना, लिखना, चलना, दौड़ना इत्यादि। हिन्दी में क्रिया के रूप ‘लिंग’, ‘वचन’ और ‘पुरुष’ के अनुसार बदलते हैं।

धातु : क्रिया /Kriya(Verb) के मूल रूप को धातु कहते हैं।

‘धातु’ से ही क्रिया /Kriya(Verb) पद का निर्माण होता है इसीलिए क्रिया के सभी रूपों में ‘धातु’ उपस्थित रहती है। जैसे-

चलना क्रिया में ‘चल’ धातु है।

पढ़ना क्रिया में ‘पढ़’ धातु है।

प्रायः धातु में ‘ना’ प्रत्यय जोड़कर क्रिया का निर्माण होता है।

धातु के दो भेद हैं—मूल धातु, यौगिक धातु।

(I) मूल धातु : यह स्वतन्त्र होती है तथा किसी अन्य शब्द पर निर्भर नहीं होती, जैसे—जा, खा, पी, रह आदि ।

(II) यौगिक धातु : यौगिक धातु मूल धातु में प्रत्यय लगाकर, कई धातुओं को संयुक्त करके अथवा संज्ञा और विशेषण में प्रत्यय लगाकर बनाई जाती है। यह तीन प्रकार की होती है-

  1. प्रेरणार्थक क्रिया /Kriya(Verb) (धातु)

  2. यौगिक क्रिया /Kriya(Verb)(धातु)

  3. नाम धातु 

  • प्रेरणार्थक क्रिया (धातु) :प्रेरणार्थक क्रियाएँ अकर्मक एवं सकर्मक दोनों क्रियाओं से बनती हैं या जिन क्रियाओं से यह बोध होता है कि कर्ता स्वयं कार्य न करके किसी दूसरे कार्य को करने के लिए प्रेरित करता है, उन्हें प्रेरणार्थक क्रिया कहते हैं; जैसे-
मूल धातुप्रेरणार्थक धातु
उठनाउठाना, उठवाना
सोनासुलाना, सुलवाना
देनादिलाना, दिलवाना
खानाखिलाना, खिलवाना
करनाकराना, करवाना
पीनापिलाना, पिलवाना

 

  • यौगिक क्रिया (धातु) :

दो या दो से अधिक धातुओं के संयोग से यौगिक क्रिया बनती है। जैसे-रोना-धोना, उठनाबैठना, चलना-फिरना, खा लेना, उठ बैठना, उठ जाना।

  • नाम धातु :

संज्ञा या विशेषण से बनने वाली धातु को नाम धातु कहते हैं। जैसे—गाली से गरियाना, लात से लतियाना, बात से बतियाना ।

क्रिया /Kriya(Verb) के भेदः रचना की दृष्टि से क्रिया के दो भेद हैं

  1. सकर्मक क्रिया /Kriya(Verb)

  2. अकर्मक क्रिया /Kriya(Verb)

  • सकर्मक क्रिया (Transitive Verb) :

जो क्रिया कर्म के साथ आती है, या जिन क्रियाओं के कार्य का फल कर्ता को छोड़कर कर्म पर पड़ता है उन्हें ‘सकर्मक क्रिया कहते हैं, जैसे-

  1. राम फल खाता है। (खाना क्रिया के साथ कर्म फल है)
  2. सीता गीत गाती है। (गाना क्रिया के साथ गीत कर्म है)
  • अकर्मक क्रिया (Intransitive Verb) :

अकर्मक क्रिया के साथ कर्म नहीं होता तथा उसका फल कर्ता पर पड़ता है या जिन क्रियाओं के कार्य का फल ‘कर्ता’ में ही रहता है उन्हें ‘अकर्मक क्रिया’ कहते हैं, जैसे-

  1. राधा रोती है। (कर्म का अभाव है तथा रोती है क्रिया का फल राधा पर पड़ता है)
  2. मोहन हँसता है।(कर्म का अभाव है तथा हँसता है क्रिया का फल मोहन पर पड़ता है)

जिन धातुओं का प्रयोग अकर्मक और सकर्मक दोनों रूपों में होता है उन्हें उभयविध धातु कहते हैं।

कुछ क्रियाएँ एक कर्म वाली और दो कर्म वाली होती हैं; जैसे-राहुल ने रोटी खाई। इस वाक्य में कर्म एक ही है। किन्तु मैं लड़के को गणित पढ़ाता हैं। इस वाक्य में दो कर्म हैं-लड़के को’ और गणित। दो कर्म वाली क्रिया को द्विकर्मक क्रिया कहते हैं।

क्रिया के कुछ अन्य भेद निम्नवत् हैं

  • सहायक क्रिया (Helping Verb) :

सहायक क्रिया मुख्य क्रिया के साथ प्रयुक्त होकर अर्थ को स्पष्ट एवं पूर्ण करने में सहायता करती है। जैसे-

  1. मैं घर जाता हूँ। (यहाँ ‘जाना’ मुख्य क्रिया है और हूँ’ सहायक क्रिया है) ।
  2. वे हँस रहे थे। (यहाँ हँसना’ मुख्य क्रिया है और ‘रहे थे’ सहायक क्रिया है)
  • पूर्वकालिक क्रिया (Absolutive Verb) :

जब कर्ता एक क्रिया को समाप्त कर दूसरी क्रिया करना प्रारम्भ करता है तब पहली क्रिया को पूर्वकालिक क्रिया कहा जाता है अथवा जिन क्रियाओं के पहले कोई अन्य क्रिया आए, उन्हें पूर्वकालिक क्रिया कहते हैं।

जैसे—राम भोजन करके सो गया।

यहाँ भोजन करके पूर्वकालिक क्रिया है, जिसे करने के बाद उसने दूसरी क्रिया (सो जाना) सम्पन्न की है।

  • नामबोधक क्रिया(Nominal Verb) :

संज्ञा अथवा विशेषण के साथ क्रिया जुड़ने से नामबोधक क्रिया बनती है। जैसे-

संज्ञा+क्रिया=नामबोधक क्रिया
1.लाठी+मारना=लाठी मारना
2.रक्त+खौलना=रक्त खौलना
विशेषण+क्रिया=नामबोधक क्रिया
1.दुःखी+होना=दुःखी होना
2.पीला+पड़ना=पीला पड़ना

 

  • द्विकर्मक क्रिया(Double Transitive Verb) :

जिस क्रिया के दो कर्म होते हैं उसे द्विकर्मक क्रिया कहा जाता है। जैसे-

  1. अध्यापक ने छात्रों को हिन्दी पढ़ाई। (दो कर्म–छात्रो, हिन्दी)
  2. श्याम ने राम को थप्पड़ मार दिया। (दो कर्म–राम, थप्पड़)
  • संयुक्त क्रिया (Compound Verb) : जब कोई किया दो क्रियाओं के संयोग या दो या दो से अधिक क्रियाओं के योग से जो पूर्ण क्रिया से निर्मित होती है, तब उसे संयुक्त क्रिया कहते हैं। जैसे-
  1. वह खाने लगा।
  2. मुझे पढ़ने दी।
  3. वह पेड़ से कूद पड़ा।
  4. मैंने किताब पढ़ ली।
  5. वह खेलती कृती रहती है ।
  6. आप आते जाते हैं।
  7. चिड़ियां उड़ा करती हैं।
  8. अब त्यागपत्र दे ही डालो।
  • क्रियार्थक संज्ञा (Verbal Noun) : जब कोई क्रिया संज्ञा की भांति व्यवहार में आती है तब उसे क्रियार्थक संज्ञा कहते हैं।जैसे-
  1. टहलना स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है।
  2. देश के लिए धरना कीर्तिदायक है।

क्रियाओं में रूपान्तर

क्रिया विकारी शब्द है अत: इसके रूप में परिवर्तन होता रहता है।

इस परिवर्तन के छ: आधार हैं

क्रिया के सम्बन्ध में निम्न तथ्य भी विचारणीय हैं :

  • वाच्य (voice) : वाच्य क्रिया का रूपान्तरण है जिसके द्वारा यह पता चलता है कि वाक्य में कर्ता, कर्म या भाव में से किसकी प्रधानता है।

वाच्य के तीन भेद हैं-

  1. कृतवाच्य (Active Voice)

  2. कर्मवाच्य (Passive Voice)

  3. भाववाच्य (Impersonal Voice)

  • कृतवाच्य (Active Voice): क्रिया के उस रूपान्तरण को कर्तवाच्य कहते हैं, जिससे वाक्य में कर्ता की प्रधानता का बोध होता है। जैसे-
  1. राम ने दूध पिया।
  2. सीता गाती है।
  3. मैं स्कूल गया ।
  • कर्मवाच्य (Passive Voice): क्रिया के उस रूपान्तरण को कर्मवाच्य कहते हैं, जिससे वाक्य में कर्म की प्रधानता का बोध होती है । जैसे-
  1. लेख लिखा गया ।
  2. गीत गाया गया ।
  3. पुस्तक पढ़ी गई।
  • भाववाच्य (Impersonal Voice): क्रिया का वह रूपान्तर भाववाच्य कहलाता है, जिससे वाक्य में ‘भाव’ (या क्रिया) की प्रधानता का बोध होता है। जैसे-
  1. मुझसे चला नहीं जाता।
  2. उससे चुप नहीं रहा जाता ।
  3. सीता से दूध नहीं पिया जाता।
  • प्रयोग : क्रिया के पुरुष, लिंग और वचन कहीं कर्ता के अनुसार होते हैं, कहीं कर्म के अनुसार और कहीं क्रिया के अनुसार होते हैं।

कर्ता, कर्म, या भाव का- इस आधार पर तीन प्रकार के ‘प्रयोग’ माने गए हैं-

  1. कर्तरि प्रयोग

  2. कर्मणि प्रयोग

  3. भावे प्रयोग

  • कर्तरि प्रयोग : इन वाक्यों में क्रिया के लिंग, वचन और पुरुष कर्ता के लिंग, वचन और पुरुष के अनुसार होते हैं। जैसे-
  1. राम पुस्तक पढ़ता है। (क्रिया कर्तानुसारी है)
  2. सीता आम खाती है। (क्रिया कर्तानुसारी है)
  • कर्मणि प्रयोग : जब वाक्य में क्रिया के लिंग, वचन, पुरुष कर्म का अनुसरण करते हैं, तब कर्मणि प्रयोग होता है। जैसे-
  1. राधा ने गीत गाया। (क्रिया कर्म के अनुसार पुलिंग है)
  2. मोहन ने किताब पढ़ी।(क्रिया कर्म के अनुसार स्त्रीलिंग है)
  • भावे प्रयोग : जब वाक्य की क्रिया के लिंग, वचन और पुरुष, कर्ता का अनुसरण न कर सदैव एकवचन, पुलिंग एवं अन्य पुरुष में हो तब भावे प्रयोग होता है। जैसे-
  1. राम से गाया नहीं जाता।
  2. सीता से गाया नहीं जाता।
  3. लड़कों से गाया नहीं जाता।

इन तीनों वाक्यों में कर्ता के बदलने पर भी क्रिया अपरिवर्तित है तथा वह एकवचन, पुलिग, अन्य पुरुष में है अतः ये भाव प्रयोग हैं।

  • काल (Tense) :क्रिया के जिस रूप से कार्य व्यापार के समय तथा उसकी पूर्णता अथवा अपूर्णता का बोध होता है, उसे काल कहते हैं। या क्रिया के जिस काल रूप से उसके होने के समय का बोध होता है, उसे काल कहते हैं।

काल के तीन भेद होते हैं

  1. वर्तमान काल

  2. भूतकाल

  3. भविष्यत् काल

  • वर्तमान काल : क्रिया के जिस रूप से वर्तमान समय में क्रिया का होना पाया जाए, उसे वर्तमान काल कहते हैं। इसमें क्रिया का आरम्भ हो चुका होता है पर समाप्ति नहीं है।

इसके पांच भेद हैं :

सामान्य वर्तमानयह पढ़ता है।
तात्कालिक वर्तमानयह पढ़ रहा है।
पूर्ण वर्तमानवह पढ़ चुका है।
संदिग्ध वर्तमानवह पढ़ता होगा ।
संभाव्य वर्तमानवह पढ़ता हो ।

 

  • भूतकाल : क्रिया के जिस रूप से कार्य की समाप्ति का बोध हो उसे ‘भूतकाल’ कहते हैं। दूसरे शब्दों में जिस क्रिया से बीते हुए समय में क्रिया का होना पाया जाता है उसे भूतकाल कहते हैं।

भूतकाल के छः भेद हैं :

  1. सामान्यभूत : क्रिया के जिस रूप से बीते हुए समय का निश्चित ज्ञान न हो उसे सामान्यभूत कहते हैं;

जैसे-श्याम गया। गीता आई।

  1. आसन्नभूत : क्रिया के जिस रूप से क्रिया के व्यापार का समय आसन्न (निकट) ही समाप्त समझा जाए उसे आसन्नभूत कहते हैं;

जैसे-अंकुर नैनीताल से लौटा है। मैं खाना खा चुका हूँ।

  1. अपूर्णभूत : क्रिया के जिस रूप से यह जाना जाए कि क्रिया भूतकाल में हो रही थी, लेकिन उसकी समाप्ति का पता न चले, उसे ‘अपूर्णभूत’ कहते हैं;

जैसे-सितार बज रहा था।

  1. पूर्णभूत : क्रिया के जिस रूप से बीते समय में कार्य की समाप्ति का पूर्ण बोध होता है, उसे पूर्णभूत कहते हैं;

जैसे-मैं खाना खा चुका हूँ।

  1. संदिग्धभूत : क्रिया के जिस रूप से बीते हुए समय में कार्य के पूर्ण होने या न होने में सन्देह होता है, उसे संदिग्धभूत कहते हैं,

जैसे-श्याम ने गाया होगा।

  1. हेतुहेतुमदभूत : क्रिया के जिस रूप से यह पता चले कि क्रिया भूतकाल में होने वाली थी पर किसी कारणवश न हो सकी, उसे हेतुहेतुमद्भूत कहते हैं;

जैसे-यदि वह पढ़ता तो परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाता।

  • भविष्यत् काल : क्रिया के जिस रूप से भविष्य में होने वाली क्रिया का बोध हो, उसे भविष्यत् काल कहते हैं।

इसके तीन भेद हैं :

  1. सामान्य भविष्यत् : क्रिया के जिस रूप से भविष्य में होने वाले कार्य के सम्बन्ध में सामान्य हो अथवा यह व्यक्त हो कि क्रिया सामान्यतः भविष्य में होगी, उसे सामान्य भविष्यत् कहते हैं;

जैसे-लता गीत गाएगी।

  1. सम्भाव्य भविष्यत् : क्रिया का वह रूप जिससे कार्य होने की सम्भावना का बोध हो, उसे सम्भाव्य भविष्यत् कहते हैं;

जैसे-सम्भव है कि वह कल जाएगा।

  1. हेतुहेतुमद् भविष्यत् : क्रिया का वह रूप जिससे भविष्य में एक समय में एक क्रिया का होना दूसरी क्रिया पर निर्भर हो हेतुहेतुमद् भविष्यत् कहलाता है।

जैसे-राम गाए तो मैं बजाऊँ।

क्रिया का पद परिचय (Parsing of Verb) :

क्रिया के पद परिचय में क्रिया, क्रिया का भेद, वाच्य, लिंग, पुरुष, वचन, काल और वह शब्द जिससे क्रिया का संबंध है, बतानी चाहिए। जैसे-

  1. राम ने पुस्तक पढ़ी।

पढ़ी- क्रिया, सकर्मक, कर्मवाच्य, सामान्य भूत, स्त्रीलिंग, एकवचन, कर्म पुस्तक से सम्बन्धित् ।

  1. मोहन कल जायेगा।

जायेगा- क्रिया, अकर्मक, कर्तृवाच्य, सामान्य भविष्यत्, पुलिंग, एकवचन, कर्ता मोहन से सम्बन्धित

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विशेषण/Visheshan (Adjective) और उसके भेद

विशेषण/Visheshan (Adjective)

 

विशेषण/Visheshan (Adjective) परिभाषा :

जो शब्द संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बतलाते हैं उन शब्दों को विशेषण/Visheshan (Adjective) कहते हैं।

जो शब्द विशेषता बताते हैं, उन्हें विशेषण/Visheshan (Adjective)कहा जाता है और जिसकी विशेषता बताई जाती है, उसे विशेष्य कहा जाता है।जैसे—

मोटा लड़का हँस पड़ा।

यहाँ ‘मोटा’ विशेषण है तथा ‘लड़का’ विशेष्य (संज्ञा) है।

विशेषण/Visheshan (Adjective) के भेद-

विशेषण मूलतः चार प्रकार के होते हैं

  1. सार्वनामिक विशेषण
  2. गुणवाचक विशेषण
  3. संख्यावाचक विशेषण
  4. परिमाणबोधक विशेषण

(1) सार्वनामिक विशेषण (Demonstrative Adjective) :

विशेषण के रूप में प्रयुक्त होने वाले सर्वनाम को सार्वनामिक विशेषण कहा जाता है या जो सर्वनाम शब्द संज्ञा के लिए विशेषण का काम करते हैं, उन्हें ‘सार्वनामिक विशेषण’ कहते हैं। यह, वह, जो, कौन, क्या, कोई, ऐसा, ऐसी, वैसा, वैसी इत्यादि ऐसे सर्वनाम हैं जो संज्ञा शब्दों के पहले प्रयुक्त होकर विशेषण का कार्य करते हैं, इसलिए इन्हें सार्वनामिक विशेषण कहते हैं। जब ये सर्वनाम अकेले प्रयुक्त होते हैं तो सर्वनाम होते हैं।

इनके दो उपभेद हैं-

(i) मौलिक सार्वनामिक विशेषण :

जो सर्वनाम बिना रूपान्तर के मौलिक रूप में संज्ञा के पहले आकर उसकी विशेषता बतलाते हैं उन्हें इस वर्ग में रखा जाता है। जैसे-

  1. यह घर मेरा है।
  2. वह किताब फटी है।
  3. कोई आदमी रो रहा है।

(ii) यौगिक सार्वनामिक विशेषण :

जो सर्वनाम रूपान्तरित होकर संज्ञा शब्दों की विशेषता बतलाते हैं, उन्हें यौगिक सार्वनामिक विशेषण कहा जाता है। जैसे-

  1. ऐसा आदमी नहीं देखा।
  2. कैसा घर चाहिए ?
  3. जैसा देश वैसा भेष ।

(2) गुणवाचक विशेषण (Adjective of Quality):

जो शब्द संज्ञा अथवा सर्वनाम के गुण-धर्म, स्वभाव का बोध कराते हैं, उन्हें गुणवाचक सर्वनाम कहते हैं। गुणवाचक विशेषण अनेक प्रकार के हो सकते हैं। जैसे-

कालबोधकनया, पुराना, ताजा, मौसमी, प्राचीन।
भावबोधकशूरवीर, कायर, बलवान, दयालु, निर्दयी, अच्छा, बुरा आदि।
रंगबोधकलाल, पीला, काला, नीला, बैंगनी, हरा।
दशाबोधकमोटा, पतला, युवा, वृद्ध, गीला, सूखा
समयबोधकप्रात:कालीन, सायंकालीन, मासिक, त्रैमासिक, साप्ताहिक, दैनिक इत्यादि।
गुणबोधकअच्छा, भला, बुरा, कपटी, झूठा, सच्चा, पापी, न्यायी, सीधा, सरल।
आकारबोधकगोल, चौकोर, तिकोना, लम्बा, चौड़ा, नुकीला, सुडौल, पतला, मोटा।
स्थानबोधकग्रामीण, शहरी, मैदानी, पहाड़ी, पंजाबी, बिहारी इत्यादि।

 

(3) संख्यावाचक विशेषण (Adjective of Number) :

जो शब्द संज्ञा अथवा सर्वनाम की संख्या का बोध कराते हैं, उन्हें संख्यावाचक विशेषण कहा जाता है। जैसे-एक मेज, चार कुर्सियाँ, दस पुस्तकें, कुछ रुपए इत्यादि।ये दो प्रकार के होते हैं-

(i) निश्चित संख्यावाचक :

जिन विशेषण शब्दों से निश्चित संख्या का बोध होता है, उन्हें निश्चित संख्यावाचक विशेषण कहते हैं; जैसे- दस लड़के, बीस आदमी, पचास रुपये, एक, दो, तीन; पहला, दूसरा, तीसरा; इकहरा, दोहरा; दोनों, तीनों, चारों, पाँचों इत्यादि।

निश्चित संख्यावाचक विशेषणों को प्रयोग के अनुसार निम्न भेदों में विभक्त किया जा सकता है-

गणनावाचकएक, दो, चार, आठ, बारह।
क्रमवाचकपहला, दसवां, सौवां, चौथा।
आवृत्तिवाचकतिगुना, चौगुना, सौगुना।
समुदायवाचकचारों, आठों, तीनों।

 

(ii) अनिश्चित संख्यावाचक :

जिन विशेषण शब्दों से अनिश्चित संख्या का बोध होता है, उन्हें अनिश्चित संख्यावाचक विशेषण कहते हैं;

जैसे-थोड़े आदमी, कुछ रुपए आदि।

  1. कुछ आदमी चले गए।
  2. कई लोग आए थे।
  3. सब कुछ समाप्त हो गया।

(4) परिमाणबोधक विशेषण (Adjective of Quantity) :

जिन विशेषणों से संज्ञा अथवा सर्वनाम के परिमाण (नाप-तौल) का बोध होता है, उन्हें परिमाणबोधक विशेषण कहते हैं। इनके भी दो भेद हैं-

(i) निश्चित परिमाणवाचक

(ii) अनिश्चित परिमाणवाचक।

(i) निश्चित परिमाणवाचक-

जिन विशेषण शब्दों से संज्ञा की निश्चित मात्रा का बोध होता है उन्हें निश्चित परिमाणवाचक विशेषण कहते हैं;

जैसे—एक लीटर दूध, दस मीटर कपड़ा, एक किलो आलू आदि।

(ii) अनिश्चित परिमाणवाचक-

जिन विशेषण शब्दों से संज्ञा की अनिश्चित मात्रा का बोध होता है, उन्हें ‘अनिश्चित परिमाणवाचक विशेषण कहते हैं;

जैसे-थोड़ा दूध, कुछ शहद, बहुत पानी, अधिक पैसा आदि।। |

प्रविशेषण : वे शब्द जो विशेषणों की विशेषता बतलाते हैं, प्रविशेषण कहे जाते हैं। जैसे-

  1. वह बहुत तेज दौड़ता है।

यहां ‘तेज’ विशेषण है और बहुत’ प्रविशेषण है क्योंकि

यह तेज की विशेषता बतला रहा है।

  1. सीता अत्यन्त सुन्दर है।

यहाँ ‘सुन्दर’ विशेषण है तथा अत्यन्त’ प्रविशेषण है।

विशेषणार्थक प्रत्यय : संज्ञा शब्दों को विशेषण/Visheshan (Adjective) बनाने के लिए उनमें जिन प्रत्ययों को जोड़ा जाता है, उन्हें विशेषणार्थक प्रत्यय कहते हैं। जैसे-

प्रत्ययसंज्ञा शब्दविशेषण
ईलाचमकचमकीला
इकअर्थआर्थिक
मानबुद्धिबुद्धिमान
धनधनी
वानदयादयावान
ईयभारतभारतीय

 

विशेषण/Visheshan (Adjective) की तुलनावस्था :

तुलनात्मक विशेषण विशेषण संज्ञा शब्दों की विशेषता बतलाते हैं। यह विशेषता किसी में सामान्य, किसी में कुछ अधिक और किसी में सबसे अधिक होती है। विशेषणों के इसी उतार-चढ़ाव को तुलना कहा जाता है। इस प्रकार दो या दो से अधिक वस्तुओं या भावों के गुण, मान आदि के मिलान या तुलना करने वाले विशेषण को तुलनात्मक विशेषण कहते हैं। हिन्दी में तुलनात्मक विशेषण की तीन अवस्थाएँ हैं।

  • मूलावस्था (Positive Degree)

  • उत्तरावस्था (Comparative Degree)

  • उत्तमावस्था (Superlative Degree)

  1. मूलावस्था (Positive Degree) -इसमें तुलना नहीं होती; सामान्य रूप से विशेषता बतलाई जाती है; जैसे—अच्छा, बुरा, बहादुर, कायर आदि।
  2. उत्तरावस्था (Comparative Degree) -इसमें दो की तुलना करके एक की अधिकता या न्यूनता दिखाई जाती है; जैसे-राम श्याम से अधिक बुद्धिमान है। इस वाक्य में राम की बुद्धिमत्ता श्याम से अधिक बताई गई है, अतः यहाँ तुलनात्मक विशेषण की उत्तरावस्था’ है।
  3. उत्तमावस्था (Superlative Degree) इसमें दो से अधिक वस्तुओं, भावों की तुलना करके एक को सबसे अधिक या न्यून बताया जाता है. जैसे—अंकुर कक्षा में सबसे अधिक बुद्धिमान है। इस वाक्य में अंकुर को कक्षा में सबसे अधिक बुद्धिमान बतलाया गया है अतः यहाँ तल विशेषण की उत्तमावस्या है।

तुलनात्मक विशेषण की दृष्टि से विशेषणों के रूप इस प्रकार होते हैं-

मूतावस्थाउत्तरावस्थाउत्तमावस्था
लघुलघुतरलघुतम
अधिकअधिकतरअधिकतम
उच्चउच्चतरउच्चतम
कोमलकोमलतरकोमलतम
गुरुगुरुतरगुरुतम
निकटनिकटतरनिकटतम
निम्ननिम्नतरनिम्नतम
बृहत्बृहत्तरबृहत्तम
महत्महत्तरमहत्तम
सुन्दरसुन्दरतरसुन्दरतम

 

विशेषण/Visheshan (Adjective) का पद परिचय (Parsing of Adjective) :

वाक्य में विशेषण पदों का अन्वय (पद परिचय) करते समय उसका स्वरूप-भेद, लिंग, वचन, कारक और विशेष्य बताया जाता है। जैसे-

काला कुत्ता मर गया।

काला—विशेषण, गुणवाचक, रंगबोधक, पुलिंग, एकवचन, विशेष्य- कुत्ता ।

मुझे थोड़ी बहुत जानकारी है।

थोड़ी बहुत—विशेषण, अनिश्चित संख्यावाचक, स्त्रीलिंग, कर्मवाचक, विशेष्य–जानकारी।

विशेषण सम्बन्धी महत्त्वपूर्ण अनुदेश

  • हिन्दी में विशेषण शब्दों के आगे विभक्ति चिह्न नहीं लगते; जैसे-वीर मनुष्य, अच्छे घर का।
  • विशेषण के लिंग वचन और कारक वही होते हैं जो ‘विशेष्य’ के; जैसे-अच्छे विद्यार्थी, अच्छा विद्यार्थी आकारान्त विशेषण स्त्रीलिंग में ईकारान्त हो जाते हैं, जैसे-काला घोड़ा, काली घोड़ी, अच्छा लड़का, अच्छी लड़की आदि।
  • पुल्लिग आकारान्त विशेषण का अन्तिम ‘आ’ कर्ता कारक एकवचन को छोड़कर अन्य सब कारकों में ‘ए’ हो जाता है; जैसे-अच्छे लड़के को; बुरे लोगों से।
  • विशेषणों की विशेषता बताने वाला शब्द भी विशेषण होता है; जैसे-थोड़ा फटा कपड़ा, बहुत सुन्दर घर आदि।
  • संस्कृत विशेषणों के रूप हिन्दी में विशेष्य के लिंग के अनुसार कभी नहीं बदलते और कभी बदल जाते हैं; जैसे-सुन्दर काया, सुशील लड़की आदि।

 


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Sarvnam/सर्वनाम (Pronoun) और उसके भेद

Sarvnam सर्वनाम (Pronoun)

 

परिभाषा : संज्ञा के स्थान पर प्रयुक्त होने वाले शब्दों को सर्वनाम / Sarvnam (Pronoun) कहते हैं।

जैसे- मैं, तुम, हम, वे, आप आदि शब्द सर्वनाम हैं।

सर्वनाम / Sarvnaam शाब्दिक अर्थ है- सबका नाम । सर्वनाम शब्द ‘सर्व’ + ‘नाम’ से मिलकर बना है। ‘सर्व’ का अर्थ है–सब और ‘नाम’ का अर्थ है संज्ञा। ये शब्द किसी व्यक्ति विशेष के द्वारा प्रयुक्त न होकर सबके द्वारा प्रयुक्त होते हैं तथा किसी एक का नाम न होकर सबका नाम होते हैं। इसमें पहली बात यह है कि सर्वनाम वे संज्ञा शब्द हैं जो सबके लिए प्रयुक्त होत है; जैसे-‘मैं’ शब्द को हम अपने लिए प्रयुक्त कर सकते हैं, रमेश अपने लिए, सुरेश अपने लिए अर्थात् सभी लोग अपने-अपने लिए ‘मैं’ शब्द का प्रयोग कर सकते हैं। दूसरी बात यह है कि सर्वनाम पूर्वापर सम्बन्ध के साथ प्रयुक्त होता है। पूर्वापर शब्द पूर्व’ + अपर’ से मिलकर बना है, पर्व का अर्थ है-पहले और अपर का अर्थ है—बाद का।

अतः जब सर्वनाम / Sarvnaam शब्द का प्रयोग किया जाएगा तो पूर्वापर अर्थात् ‘पहले और बाद के सम्बन्ध का ध्यान रखा जाएगा।

उदाहरणार्थ-राम बाजार गया है, राम नौ बजे आएगा, राम भोजन करके कालेज चला जाएगा। यहाँ ‘राम’ शब्द बार-बार आया है, किसी भी शब्द का बार-बार आना अच्छा नहीं लगता। यदि यहाँ राम शब्द के स्थान पर सर्वनाम का प्रयोग कर दिया जाए तो वह अप्रिय नहीं लगेगा; जैसे—राम बाजार गया है। वह नौ बजे आएगा और भोजन करके कालेज चला जाएगा। यहाँ पर वह शब्द का प्रयोग पूर्वापर सम्बन्ध से ही किया गया है। राम शब्द पूर्व आया है इसके बाद (अपर) ‘वह’ शब्द आया है। इस प्रकार संज्ञा शब्दों की पुनरावृत्ति रोकना और उनके स्थान पर स्वयं कार्य करना सर्वनाम का उद्देश्य है। हिन्दी में सर्वनामों की संख्या ग्यारह है-मैं, तू, आप, यह, वह, जो, सो, कोई, कुछ, कौन, क्या।

सर्वनाम / Sarvnam के भेद

व्यावहारिक आधार पर सर्वनाम के छः भेद बताए गए हैं –

(1) पुरुषवाचक सर्वनाम / Sarvnam

(2) निश्चयवाचक सर्वनाम / Sarvnam

(3) अनिश्चयवाचक सर्वनाम / Sarvnam

(4) संबंधवाचक सर्वनाम / Sarvnam

(5) प्रश्नवाचक सर्वनाम / Sarvnam

(6) निजवाचक सर्वनाम / Sarvnam

(1) पुरुषवाचक सर्वनाम (Personal Pronoun) :

पुरुषवाचक सर्वनाम— वक्ता, श्रोता और अन्य (जिसके सम्बन्ध में बात हो) का , सर्वनाम, पुरुषवाचक सर्वनाम कहलाता है।

पुरुषवाचक सर्वनाम तीन प्रकार के होते हैं

  1. उत्तम पुरुष
  2. मध्यम पुरुष
  3. अन्य पुरुष

उत्तम पुरुष- मैं, हम, मैंने, हमने, मेरा, हमारा, मुझे, मुझको ।

मध्यम पुरुष- तू, तुम, तुमने, तुझे, तूने, तुम्हें, तुमको, तुमसे, आपने, आपको ।

अन्य पुरुष–वह, यह, वे, ये, इन, उन, उनको, उनसे, इन्हें, उन्हें, इससे, उसको ।

(क) उत्तम पुरुष- वक्ता या लेखक जिन सर्वनामों का प्रयोग अपने लिए करता है उसे उत्तम पुरुषवाचक सर्वनाम कहते हैं; जैसे—मैं पढ़ता हैं। इस वाक्य में वक्ता या लेखक ने अपने लिए ‘मैं’ सर्वनाम का प्रयोग किया है। अतः यह उत्तम पुरुषवाचक सर्वनाम है। इसी प्रकार हम दिल्ली जाएँगे। वाक्य में ‘हम’ उत्तम पुरुषवाचक सर्वनाम है।

(ख) मध्यम पुरुष- वक्ता या लेखक जिससे अपनी बात कहता है उसके लिए प्रयुक्त होने वाले सर्वनाम को मध्यम पुरुषवाचक सर्वनाम कहते हैं; जैसे-

  • तू कहाँ गया था?
  • तुम अपना कार्य नहीं करते हो।
  • आप भोजन करें।

इन वाक्यों में तू, तुम और आप मध्यम पुरुषवाचक सर्वनाम हैं।

(ग) अन्य पुरुष- वक्ता या लेखक, श्रोता या पाठक से जिसके विषय में बात करता है उसके लिए प्रयुक्त होने वाला सर्वनाम अन्य पुरुषवाचक कहलाता है; जैसे –

  • वे कौन हैं?
  • वह दुष्ट है।
  • यह कलम है।
  • ये बन्दर हैं।

इन वाक्यों में वे, वह, यह, ये शब्द अन्यपुरुष वाचक सर्वनाम हैं।

(2) निश्चयवाचक सर्वनाम (Demonstrative Pronoun) :

निकट या दूर के व्यक्तियों या वस्तुओं का निश्चयात्मक संकेत जिन शब्दों से व्यक्त होता है, उन्हें निश्चयवाचक सर्वनाम कहते हैं। जैसे—यह, वह, ये, वे ।

  1. यह मेरी पुस्तक है।
  2. वह उनकी मेज है।
  3. ये मेरे हथियार हैं।
  4. वे तुम्हारे आदमी हैं।

(3) अनिश्चयवाचक सर्वनाम (Indefinite Pronoun):

जिन सर्वनामों से किसी निश्चित वस्तु का बोध नहीं होता उन्हें अनिश्चयवाचक सर्वनाम कहते हैं। जैसे- कोई, कुछ।

  1. कोई आ गया तो क्या करोगे ?
  2. उसने कुछ नहीं लिया।

(4) संबंधवाचक सर्वनाम (RelativePronoun):

जिस सर्वनाम से किसी दूसरे सर्वनाम से संबंध स्थापित किया जाय, उसे संबंधवाचक सर्वनाम कहते हैं। जैसे- जो, सो।

  1. जो आया है, सो जायेगा यह ध्रुव सत्य है।

(5) प्रश्नवाचक सर्वनाम (Interrogative Pronoun) :

प्रश्न करने के लिए प्रयुक्त होने वाले सर्वनाम शब्दों को प्रश्नवाचक सर्वनाम कहा जाता है। जैसे- कौन, क्या ?

  1. कौन आया था ?
  2. वह क्या कह रहा था ?
  3. दूध में क्या गिर पड़ा ?

(6) निजवाचक सर्वनाम (Reflexive Pronoun):

वक्ता या लेखक जहाँ अपने लिए ‘आप’ या ‘अपने आप’ शब्द का प्रयोग करता है वहाँ निजवाचक सर्वनाम होता है। निजवाचक सर्वनाम है—आप । यह अपने आप या ‘स्वयं’ के लिए प्रयुक्त सर्वनाम है। जैसे—यह कार्य मैं ‘आप’ ही कर लूंगा।

ध्यान रहे कि यहाँ प्रयुक्त ‘आप’ स्वयं के लिए प्रयुक्त है। जो कि पुरुषवाचक मध्यम पुरुष आदरणीय सर्वनाम ‘आप’ से अलग है।

कभी-कभी कुछ ‘शब्द-समूह’ भी सर्वनाम के रूप में प्रयुक्त होते हैं। जैसे—

  1. कुछ न कुछ,
  2. कोई न कोई,
  3. सब कुछ,
  4. हर कोई,
  5. कुछ भी,
  6. कुछ-कुछ आदि ।

 


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Hindi

Karak/कारक(Case) और उसके प्रकार

कारक(Case)/Karak

परिभाषा :

  • संज्ञा या सर्वनाम का वाक्य के अन्य पदों (विशेषतः क्रिया) से जो संबंध होता है, उसे कारक कहते हैं।

  • क्रिया के साथ जिसका सीधा सम्बन्ध हो, उसे कारक कहते हैं।

जैसे-राम ने रावण को वाण से मारा।

इस वाक्य में राम क्रिया (मारा) का कर्ता है; रावण इस मारण क्रिया का कर्म है; वाण से यह क्रिया सम्पन्न की गई है, अतः वाण क्रिया का साधन होने से करण है।

  • वाक्य में जिस शब्द का सम्बन्ध क्रिया से होता है उसे कारक कहते हैं। इन्हें विभक्ति या परसर्ग (बाद में जुड़ने वाले) भी कहा जाता है। ये सामान्यतः स्वतन्त्र होते हैं और संज्ञा या सर्वनाम के साथ प्रयुक्त होते हैं। हिन्दी में परसर्ग। प्रत्ययों के विकसित रूप हैं अतः इन्हें परम प्रत्यय’ भी कहते हैं। संस्कृत में। सम्बन्ध और सम्बोधन को कारक नहीं माना गया है, क्योंकि इनका क्रिया से कोई सम्बन्ध नहीं रहता है। हिन्दी में सम्बन्ध और सम्बोधन को मिलाकर आठ कारक माने गए हैं।

इन कारकों के नाम एवं उनके कारक चिह्नों का विवरण इस प्रकार है-

क्र.सं.विभक्तिकारक का नामकारक चिन्ह
1प्रथमाकर्ता (Nominative)ने
2द्वितीयाकर्म (Objective)को
3तृतीयाकरण (Instrumental)से, के द्वारा
4चतुर्थीसम्प्रदान (Dative)को, के लिए
5पंचमीअपादान (Ablative)से
6षष्ठीसम्बन्ध (Genitive)का, के, की, रा, रे, री, ना, ने, नी
7सप्तमीअधिकरण (Locative)में, पर
8सम्बोधनसम्बोधन (Abdressive)हे ! ऐ ! अजी ! ओ ! अहो ! अरे ! इत्यादि।

 

कारक परिचय

  1. कर्ता कारक :

वाक्य में जिस शब्द द्वारा काम करने का बोध होता है उसे कर्ता कहते हैं; जैसे-राम ने श्याम को मारा-इस वाक्य में राम कर्ता है, क्योंकि मारा क्रिया करने वाला ‘राम’ ही है। इसका परसर्ग ने है। ने के प्रयोग के कुछ नियम निम्नलिखित हैं

  1. ‘ने’ का प्रयोग केवल तिर्यक संज्ञाओं और सर्वनाम के बाद होता है;जैसे—राम ने, लड़कों ने, मैंने, तुमने, आपने, उसने इत्यादि।
  2. ‘ने’ का प्रयोग कर्ता के साथ तब होता है जब क्रिया सकर्मक तथा सामान्यभूत, आसन्नभूत, पूर्णभूत और संदिग्धभूत कालों में कर्मवाच्य या भाववाच्य हो; जैसे-

सामान्यभूत बालक ने पुस्तक पढ़ी।

आसन्नभूत बालक ने पुस्तक पढ़ी है।

पूर्णभूत बालक ने पुस्तक पढ़ ली थी।

संदिग्धभूत बालक ने पुस्तक पढ़ी होगी।

हेतुहेतुमद्भूत बालक ने पुस्तक पढ़ी होती तो उत्तर ठीक होता।

इस प्रकार केवल अपूर्णभूतको छोड़कर शेष पाँच भूतकालों में ने का प्रयोग होता है।

  • सामान्यत: अकर्मक क्रिया के साथ ‘ने का प्रयोग नहीं होता है। लेकिन नहाना, छींकना, थूकना, खाँसना आदि में ‘ने’ का प्रयोग होता है; जैसे-मैंने छींका। राम ने थूका। आपने नहाया। उसने खाँसा इत्यादि।
  1. जब अकर्मक क्रियाएँ सकर्मक बनकर प्रयुक्त होती हैं, तब ‘ने’ का प्रयोग होता है; जैसे—

  • उसने अच्छा गाया।
  • आपने अच्छा किया।

हिन्दी में ‘ने’ का प्रयोग सुनिश्चित है लेकिन उसका सर्वत्र प्रयोग नहीं । होता। इस सम्बन्ध में उल्लेखनीय बातें इस प्रकार हैं-

  • अकर्मक क्रियाओं के साथ में’ का प्रयोग नहीं होती है, जैसे-
  • मोहन हँसता है।
  • वह आएगा।
  • श्याम गया।
  • सकर्मक क्रियाओं के साथ भी कर्ता के साथ वर्तमान और काल में ‘ने’ का प्रयोग नहीं होता है; जैसे-
  • राम रोटी खाएगी।
  • मैं चाय पीता हूँ।
  • जिन वाक्यों में बकना, बोलना, भूलना, लाना, ले जाना, चुकना आदि सहायक क्रियाएँ आती हैं उनमें ‘ने’ का प्रयोग नहीं होता है; जैसे-
  • मैं लिखना भूल गया।
  • मैं साइकिल नहीं लाया।
  • वह नहीं बोला।
  • वह पुस्तक पढ़ चुका।
  1. कर्म कारक :

वाक्य में क्रिया का प्रभाव या फल जिस शब्द पर पड़ता है उसे कर्म कहते हैं; जैसे-राम ने श्याम को मारा यहाँ कर्ता राम है और उसके मारने का फल श्याम पर पड़ता है अत: श्याम‘ ‘कर्म है। यहाँ श्याम के साथ कारक चिह्न को का प्रयोग हुआ है। इसके प्रयोग के कुछ नियम इस प्रकार हैं-

(क) कर्म कारक ‘को’ का प्रयोग चेतन या सजीव कर्म के साथ होता है; जैसे-

  • श्याम ने गीता को पत्र लिखा।
  • राम ने श्याम को पुस्तक दी।
  • पिता ने पुत्र को बुलाया।
  • गुरु ने शिष्य को शिक्षा दी।

(ख) दिन, समय और तिथि प्रकट करने के लिए को’ का प्रयोग होता है; जैसे-

  • श्याम सोमवार को लखनऊ जाएगा।
  • 15 अगस्त को दिल्ली चलेंगे।
  • रविवार को विद्यालय बन्द रहेगा।

(ग) जब विशेषण का प्रयोग संज्ञा के रूप में कर्म कारक की भाँति होता है, तब उसके साथ को’ का प्रयोग होता है; जैसे-

  • बुरों को कोई नहीं चाहता।
  • भूखों को भोजन कराओ।

उल्लेखनीय-अचेतन या निर्जीव कर्म के साथ को का प्रयोग नहीं होता; जैसे-

  • उसने खाना खाया।
  • गोपाल ने फिल्म देखी।
  • सीता घर गई।
  • फूल मत तोड़ो।
  1. करण कारक :

करण का अर्थ है-सा। संज्ञा का वह रूप जिससे किसी क्रिया के सा बोध हो, उसे करण कारक कहते हैं; जैसे- शिकारी ने शेर को बन्दूक से मारा। इस वाक्य में बन्दूक द्वारा शेर मारने का उल्लेख है अतएव बन्दूक करण कारक हुआ। करण कारक के चिह्न हैं-से, के द्वारा, द्वारा, के कारण, के साथ, के बिना, आदि। करण कारक का प्रयोग निम्नलिखित स्थितियों में होता है-

(क) साधन के अर्थ में करण कारक का प्रयोग होता है; जैसे-

  • मैंने गुरु जी से प्रश्न पूछा।
  • उसने तलवार से शत्रु को मार डाला।
  • गोता तूलिका से चित्र बनाती है।

(ख) साधक के अर्थ में भी करण कारक का प्रयोग होता है; जैसे-

  • उससे कोई अपराध नहीं हुआ।
  • मुझसे यह सहन नहीं होता।

(ग) भाववाचक संज्ञा से क्रिया विशेषण बनाते समय करण कारक का प्रयोग होता है; जैसे-

  • नम्रता से बात करो।
  • खुद से कहता हूँ।

(घ) मूल्य या भाव बताने के लिए करण कारक का प्रयोग होता है; जैसे-

  • आजकल आलू किस भाव से बिक रहा है।

(ड़) उत्पत्ति सूचक अर्थ में भी करण कारक का प्रयोग होता है; जैसे-

  • कोयला खान से निकलता है।
  • गन्ने के रस से चीनी बनाई जाती है।
  • लोभ से क्षोभ उत्पन्न होता है।

(च) प्यार, मैत्री, बैर होने पर करण कारक का प्रयोग होता है; जैसे-

  • राम को रावण से शत्रुता थी।
  • राम का विवाह सीता के साथ हुआ।
  1. सम्प्रदान कारक :

जिसके लिए कुछ किया जाए या जिसको कुछ दिया जाए इसका बोध कराने वाले शब्द को सम्प्रदान कारक कहते हैं; जैसे-उसने विद्यार्थी को पुस्तक दी वाक्य में विद्यार्थी सम्प्रदान है और इसका चिह्न को है।

कर्म और सम्प्रदान कारक का विभक्ति चिह्न को है, परन्तु दोनों के अर्थों में अन्तर है। सम्प्रदान का कोके लिए अव्यय के स्थान पर या उसके अर्थ में बुक्त होता है जबकि कर्म के को का ‘के लिए’ अर्थ से कोई सम्बन्ध नहीं है। जैसे-

कार्मकारकसमप्रदान कारक
सुनील अनिल को मारता है।सुनील अनिल को रुपए देता है।
माँ ने बच्चों को खेलते देखा।माँ ने बच्चे के लिए खिलौने खरीदे।
उस लड़के को बुलाया।उसने लड़के को मिठाइयाँ दीं।

 

सम्प्रदान कारक के प्रयोग के नियम इस प्रकार हैं

(क) किसी वस्तु को दिए जाने के अर्थ में को‘, ‘के लिएअथवा के वास्ते का प्रयोग होता है; जैसे-

  • उमेश को पुस्तकें दो।
  • अतिथि के लिए चाय लाओ।
  • बाढ़ पीड़ितों के वास्ते चन्दा दीजिए।

(ख) निमित्त प्रकट करने के लिए सम्प्रदान कारक का प्रयोग होता है; जैसे-

  • मैं गीता के लिए घड़ी लाया हूँ।
  • वह आपके लिए फल लाया है।
  • रोगी के वास्ते दवा लाओ।

(ग) अवधि का निर्देश करने के लिए भी सम्प्रदान कारक का प्रयोग होता; जैसे-

  • वह चार माह के लिए देहरादून जाएगा।
  • वे पन्द्रह दिन के लिए लखनऊ आएँगे।
  • मुझे दो दिन के लिए मोटर साइकिल चाहिए।

(घ) ‘चाहिए’ शब्द के साथ भी सम्प्रदान कारक का प्रयोग होता है; जैसे-

  • मजदूरों को मजदूरी चाहिए।
  • छात्रों के लिए पुस्तकें चाहिए।
  • बच्चों के वास्ते मिठाई चाहिए।

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