उत्तराखण्ड का इतिहास (History Of Uttarakhand)- परमार वंश

सहजपाल –

अजयपाल के पश्चात् कृमशः कल्याणशाह, सुन्दरपाल, हसदेवपाल, विजयपाल गद्दी पर बैठे। इन सभी के शासनकाल की जानकारी पूर्णतः अप्रर्याप्त है। तत्पश्चात 42वें शासक के रूप में सहजपाल पंवार नरेश बने। इनके शासनकाल की जानकारी के मुख्य स्त्रोत प्राप्य हैं।

देवप्रयाग में क्षेत्रफल के मन्दिर के द्वार पर उत्कीर्ण विकमी सम्वत् 1065 अर्थात 1548 ई के एक शिलालेख के आधार पर हरिकृष्ण रतुड़ी निष्कर्ष निकालते हैं कि सहजपाल ने गढ़राज्य पर लगभग सन् 1548 ई0 से 1575 तक शासन किया। कवि भरत ने सहजपाल की प्रशस्ति में अनेक पक्तियाँ लिखी हैं। उनका मानना है। कि सहजपाल के शासनकाल में गढ़वाल (गढ़वाल) अपने विकास के चरमतम बिन्दु पर था।

माना जाता है कि सहजपाल मुगल सम्राट अकबर का समकालीन था और अकबर के साम्राज्य की सीमाएँ लगभग समस्त उत्तर भारत में फैल चुकी थी किन्तु तब भी गढ़राज्य सहजपाल के अधीन पूर्ण स्वतन्त्रता का आनन्द ले रहा था। आर्शीवादी लाल श्रीवास्तव के अनुसार मुगलिया सल्तनत का अपनी समकालीन शक्तियों से जो सम्बन्ध थे उनमें गढ़वाल राज्य का महत्वपूर्ण स्थान था। यद्यपि श्रीनगर गढ़वाल का दिल्ली से कूटनीतिज्ञ सम्बन्ध था किन्तु प्रतीत होता है कि यह राज्य पूर्णतः स्वतंत्र था।

बलभद्रशाह ( 1575–1591 ई0) –

राजा सहजपाल के पश्चात गढ़वाल का सिहांसन बलभद्रशाह को प्राप्त हुआ। इनसे पूर्व ‘शाह’ उपाधि कल्याण शाह के नाम के साथ लगा मिलता है। लेकिन प्रतीत होता है कि “शाह उपाधि लगाने की परम्परा का प्रचलन राजा बलभद्र ने प्रारम्भ की। ‘शाह’ की इस उपाधि के पीछे भक्तदर्शन ने अपना तर्क प्रस्तुत किया है कि भारतीय इतिहास का अभागा शहजादा अपने अनुज औरंगजेब से परास्त हुआ तो उसने श्रीनगर गढ़वाल में शरण ली किन्तु श्रीनगर के शासक ने उसे औरंगजेब को सौंप दिया। इस सेवा से प्रसन्न होकर औरंगजेब ने गढ़वाल नरेश को ” शाह” की उपाधि दी। यद्यपि इस धारणा की सच्चाई संदिग्ध है क्योंकि औरंगजेब के मुगल सम्राट बनने और कल्याणशाह एवं बलभद्रशाह के शासनकाल के मध्य लगभग 100 वर्षों का अन्तर है।

इस संदर्भ में पातीराम का मत है कि गढ़वाल क्षेत्र के तल्ला नागपुर क्षेत्र के ग्राम सतेरा का बल जाति का व्यक्ति राज्यकार्य से जब दिल्ली गया तो उसने मुगल हरम की अत्यंत रूग्ण महिला जिसका अनेकों उपचार के बाद अन्त समय निकट लग रहा था, को एक धागा बाँधकर उसके रोग का पता लगाया और उसे ठीक करने में सफलता प्राप्त की। मुगल शंहशाह से उसने ही पारितोषिक में अपने राजा के लिए ‘शाह’ की उपाधि प्राप्त की थी।

इस बात में तो सत्यता है कि गढ़वाल के ग्रामीण क्षेत्रो में आज भी पीलिया (जॉडिस) का ईलाज कलाई अथवा गले में माला (धागा) बाँधकर सफलतापूर्वक होता है लेकिन पारितोषिक में किसी अन्य के द्वारा प्राप्त उपाधि का प्रयोग उपर्युक्त नहीं प्रतीत होता है। ऐसा भी माना जाता है कि दिल्ली के सुल्तान बहलोल लोदी ने बलभद्रपाल को शाह की उपाधि दी। सम्भवतः बलभद्र ने गढराज्य की शक्ति का पुर्नउत्थान किया जिसके कारण उसने शाह की उपाधि धारण की।

वॉल्टन महोदय के अनुसार बलभद्रशाह ने 1518 ई में कुमाऊँ के शासक से ग्वालदम नामक स्थान पर युद्ध किया। डा0 उबराल इस युद्ध की तिथि 1590-91 ई0 के मध्य मानते हैं। युद्ध की तिथि स्पष्ट नहीं परन्तु यह स्पष्ट है कि गढ़वाल नरेश ने 1518-91 ई0 के मध्य ही कुमाऊँ पर आक्रमण किया। अतः इस आधार पर बलभद्रशाह के शासनकाल की सम्भावित तिथि 1575-91 ई0 ठहरती है।

मानशाह –

डॉ शिवप्रसाद डबराल के अनुसार बलभद्र-शाह के बाद सन् 1591 में मानशाह ने गद्दी संभाली। मानशाह से सम्बन्धित साक्ष्य उपलब्ध है। देवप्रयाग के क्षेत्रफल मन्दिर के द्वार पर 1608 का अंतिम शिलालेख एवं इसी स्थल के रघुनाथ मन्दिर से प्राप्त शिलालेख (1610 ई0) मानशाह द्वारा उत्कीर्ण माने जाते हैं। इनके आधार पर फोस्टर महोदय की कृति ‘दि अर्ली ट्रेवल्स इन इंडिया में विलियम नामक यूरोपीय यात्री का वृतांत है जिसने गढ़वाल नरेश मानशाह का उल्लेख किया है। इसके अनुसार गढ़वाल राज्य गंगा एवं यमुना के मध्य फैला है और राजधानी ‘श्रीनगर’ है | इस राज्य की सीमा आगरा से 200 किलोमीटर दूर है। इस पूरे राज्य की लम्बाई 300 किमी और चौड़ाई 150 किमी0 है। यहाँ के शौर्यवान शासक सोने के बर्तनों में भोजन करते है। इसके आधार पर मानशाह का राज्यकाल 1591 से 1611 ई0 के मध्य बैठता है।

मानशाह के शासनकाल में कुमाऊँ के शासक लक्ष्मीचंद ने 1597-1620 ई0 के मध्य 7 आक्रमण किए किन्तु हर बार उसे पराजय का सामना करना पड़ा। बद्रीदत्त पांडे के अनुसार मानशाह के सेनापति नन्दी’ ने तो चंद राजाओं की राजधानी पर भी अधिकार कर लिया था। राहुल सांकृत्यायन का कथन भी इस मत का सर्मथन करता है कि गढ़राज्य के सेनापति ‘नंदी’ ने चम्पावत हस्तगत कर लिया था। गढ़वाल के राजकवि भरत ने अपनी कृति ‘मानोदय’ में इस विजय का विरूद्ध गया है।

श्यामशाह –

परमार वंशी 44वें शासक का नाम ‘जहांगीरनामा’ में उल्लिखित है जिसके अनुसार मुगल दरबार ने श्रीनगर के शासक को घोड़े तथा हाथी उपहार स्वरूप भेंट किए। श्यामशाह के ‘सिलासरी’ नामक ग्राम की भूमि का एक हिस्सा शिवनाथ नामक योगी को देने का सन् 1615 ई0 का ताम्रपत्र प्राप्य है एवं जहांगीर ने जो उपहार भेजे थे वे बैसाख विकमी 1678 अर्थात् अप्रैल 1621ई0 के हैं। इस आधार पर डॉ0 डबराल ने श्यामशाह का राज्यकाल 1611-30ई0 के मध्य माना है।

महीपतशाह –

श्यामशाह निःसन्तान थे अतः उनकी मृत्यु के पश्चात् उनके चाचा महीपतशाह गद्दी पर बैठे। महीपतशाह का अधिकांश जीवन युद्ध में व्यतीत हुआ। अपने शत्रुओं को निरन्तर पराजित करने के कारण इन्हें ‘गर्वभंजन’ के नाम से प्रसिद्धि मिली। सी0 वैसल्स कृत ‘अर्ली जैसूइट ट्रेवल्स इन सैन्ट्रल एशिया में प्रकाशित एनड्राडे महोदय के विवरण में महीपतशाह के तिब्बत अभियान का विस्तृत वर्णन है। इस विवरण में श्रीनगर के शासक महीपतशाह के तिब्बत पर तीन आक्रमणों का उल्लेख मिलता हैं। प्रथम अभियान में 11000 बन्दूककधारी तथा बीस छोटी-छोटी तोप वाली टुकड़ियाँ थी। द्वितीय अभियान के सैनिको की संख्या 20000 थी जबकि तृतीय अभियान में अपेक्षाकृत कम सैनिक थे। प्राकृतिक परिस्थियाँ गढ़नरेश के प्रतिकूल थी साथ ही भारी हिमपात से मार्ग अवरुद्ध होने एवं तिब्बतवासियों के कठोर प्रतिरोध के कारण गढनरेश को असफलता का सामना करना पड़ा फलतः दोनों राज्यों के मध्य सन्धि सम्पन्न हुई।

1624 ई0 में एनड़ाडे महोदय “माना स्थल को छोड़कर आगरा आ गया। इस विवरण से डॉ0 डबराल द्वारा निर्धारित पूर्व नरेश श्यामशाह के राज्यकाल की अवधि 1611-1630 ई0 गलत सिद्ध होती है। एनड्राडे के एक अन्य विवरण में जहांगीर द्वारा स्वयं एनड्राडे को फरमान जारी किये जाने के बाद भी गढ़नरेश द्वारा उसके साथ बुरा व्यवहार किया जाना इस तथ्य को प्रमाणित करता है कि जहांगीर काल में भी गढ़राज्य अपनी स्वतंत्र सत्ता कायम किये हुए था। एनड्राडे 1625 ई0 पुनः गढ़वाल के रास्ते तिब्बत गया ओर इस बार भी उसे गढ़वाल में वही अत्याचार सहन करने पड़े।

हरिकृष्ण रतुड़ी ने महीपतशाह की ‘दापा’ (ढाबा) पर अद्वितीय सफलता का वर्णन करते हैं। डॉo डबराल के अनुसार महीपतशाह ने सिरमौर के डाकुओं के आतंक को समाप्त किया। महीपतशाह के राज्यकाल की तिथि पर विद्वानों में मतैक्य नहीं है। डॉ0 डबराल ने इसे 1631-1635 ई0 माना है तो राहुल ने 1625-1664 ई0 तक माना है। जहाँ तक उनके गद्दी पर बैठने की तिथि का सम्बन्ध है वह 1622 ई0 प्रमाणित है क्योकि इस वर्ष श्यामशाह की मृत्यु हुई और महीपत उनके उत्तराधिकारी बने किन्तु मृत्यु का वर्ष विवादित है।

सी0 वैसल्स की पुस्तक में छपे अजेवेड़ो महोदय के यात्रावृतांत के अनुसार 28 जून 1631 ई0 को वह स्वयं आगरा से चला। जुलाई 1631 में महीपतशाह की अंत्येष्टि के अवसर पर वह श्रीनगर में उपस्थित था। एनड्राडे के यात्रा वृतांत से तो महीपतशाह की अन्तिम तिथि 1631 ई0 ही सिद्ध होती है। एटकिन्सन के गजेटियर में उसने 1625 ई0 के केशवराय के मठ के एक शिलालेख का विवरण दिया है जिसमें महीपतशाह के शासन का वर्णन दिया है।

एक अन्य यूरापीय विद्वान मेकगैलन ने अपने संग्रह ‘दि जैसुइट एण्ड दि ग्रेट मुगल’ में एनड्राडे की यात्रा की पुष्टि की है। उसने भी एनड़ाडे के सहयात्री का नाम ‘मार्किवस ‘ दिया है। एनड्राडे की यात्रा का उद्देश्य ईसाई धर्म का प्रचार–प्रसार था और इस कड़ी में उन्होंने 11 अप्रैल 1626 ई0 में ‘शापराँग’ नामक स्थल पर एक चर्च की स्थापना की।

महीपतशाह की शौर्यपूर्ण गाथाओं का वर्णन उसके तीन अद्वितीय सेनापतियों के उल्लेख के बगैर अधूरा रहेगा। माधोसिंह भण्डारी, रिखोला लोदी और बनवारीदास जिन्होंने महीपतशाह के भिन्न-भिन्न अभियानों में अपने अपरिमित शौर्य का परिचय दिया एवं गढ़राज्य की पताका लहराई।

पृथ्वीपतशाह –

इतिहासकारों का मत है कि पृथ्वीपतशाह 7 वर्ष की अल्पायु में गद्दी पर बैठा था। अतः महीपतशाह की रानी एवं पृथ्वीपत की। माँ रानी कर्णावती ने उसकी संरक्षिका के रूप में गढ़वाल की सत्ता की सम्भाली। वह गढ़वाल के इतिहास में ‘नाककटटी रानी’ के नाम से प्रसिद्ध है। उनका सवंत् 1697 (1640 ई0) के ताम्रपत्र से जो हाट ग्राम निवासी एक हटवाल ब्राह्मण को भूमिदान के पट्टे पर देने का है। इसके अनुसार पृथ्वीशाह की माताश्री महाराणी कर्णावती द्वारा सन् 1640 ई0 में हाट के ब्राह्मण को भूमि दान दिया गया। रानी कर्णावती का उल्लेख हस्तलिखित ‘साँवरी ग्रन्थ’ में भी आया है।

डॉ0 डबराल ने रानी कर्णावती का साम्य ‘नाक कटी रानी’ नाम से किया है। ऐसा उन्होंने एक मुगल वृतांत के आधार पर किया है जिसके अनुसार मुगल सम्राट इस तथ्य से परिचित थे कि गढ़राज्य में एक स्त्री शासन कर रही है। ‘स्टोरियो डू मोगोर के लेखक के अनुसार शाहजहाँ के शासनकाल में मुगलों की एक लाख पदाति एवं तीस हजार घुडसवारों की सेना को गढराज्य पर आक्रमण के लिए भेजा गया। इस आक्रमण में गढराज्य के वीरों ने रानी कर्णावती के निर्देशन में मुगल सेना को तहस-नहस कर दिया और जीवित पकड़े सैनिकों की नाक काट दी गई। ‘महासिरूल उमरा में भी गढ़राज्य के इस शौर्य का वर्णन है। इसके अनुसार इस आक्रमण का मुगल सेनापति ‘नजावत खॉ’ था जिसने दिल्ली जीवित पहुँचकर आत्महत्या कर ली। इससे भी बचे सैनिकों की नाक काटने की घटना की पुष्टि होती है।

मुगल शासक शायद इस अपमान को भुला नहीं पाये किन्तु यह रानी कर्णावती की योग्यता का ही प्रमाण है कि इस आक्रमण का बदला लेने के लिए भारत के सम्राट को 19 वर्ष इंतजार करना पड़ा। वर्ष 1655 ई0 में खल्लीतुल्ला के नेतृत्व में गढराज्य पर पुनः मुगल आक्रमण हुआ। पिछले आक्रमण में मुंह की खाने के कारण इस बार मुगल सेना ने सिरमौर राजा मान्धाता प्रकाश और कुमाऊँ के चन्द राजा बाजबहादुर की सहायता ली। फिर भी वे दून घाटी एवं कुछ किलों को ही विजित करने में सफल रहे। ‘ओरिएण्टल सीरीज’ के अनुसार राजधानी श्रीनगर अविजित ही रही। सम्भवतः इस बीच समझौता सम्पन्न हो गया क्योंकि गढ़ राजकुमार मेदनीशाह दिल्ली गए जहाँ उनका भव्य स्वागत किया गया था।

उत्तराधिकार युद्ध में औरंगजेब अन्ततः विजित हुआ। पराजित राजकुमार दाराशिकोह के पुत्र सुलेमान शिकोह को शरण देने के कारण कालान्तर में मुगलों से गढ़राज्य सम्बन्ध तनावपूर्ण हुए। औरंगजेब ने पृथ्वीपत को पत्र द्वारा भगोड़े राजकुमार को दिल्ली को सौपने के लिए लिखा । पृथ्वीपतशाह ने मुगल चेतावनी को नजरअंदाज ही किया। फलतः ‘ट्रैवल्स इन इडिया के अनुसार मुगल आक्रमणों के द्वारा गढ़राज्य को भयभीत करने का प्रयास किया गया किन्तु गढ़वाल की सेना ने हर बार मुगल सेना को अपार क्षति पहुँचाई । अन्ततः औरंगजेब ने कूटनीति का सहारा लिया।

कानूनगों के अनुसार राजा जयसिंह ने श्रीनगर दरबार के अधिकारियों को प्रलोभन दिए । राजकुमार सुलेमान को विष देकर मरवाने का प्रयत्न किया। हर तरह से असफल होने पर उन्होंने पृथ्वीपत के पुत्र राजकुमार मेदिनी से अपने पिता के विरूद्ध षडयंत्र करवाया। पृथ्वीपत द्वारा अपने गद्दार सरदार का सरकलम करने के कारण अन्य सरदारों एवं राजपरिवार के सदस्यों में भय उत्पन्न हुआ फलतः मेदिनी के नेतृत्व में पृथ्वीपतशाह के विरूद्ध विद्रोह हो गया।

इस बीच राजा जयसिंह का पुत्र रामसिंह सुलह के लिए गढ़वाल आया किन्तु पृथ्वीपत ने पुनः राजकुमार सुलेमान की रक्षा का प्रण दोहराया। इस बीच षडयंत्र के डर से सुलेमान स्वयं ही भाग खड़ा हुआ जिसे गढ़वाल के सीमाप्रान्त के ग्रामीणों ने पकड़कर मेदनीशाह को सौप दिया। मेदनी सुलेमान को पकड़कर दिल्ली में ले गया, जिसकी 1662 ई0 में दिल्ली में मुत्यु हुई। इस घटना का उल्लेख औरंगजेब के पृथ्वीशाह को लिखे पत्र से होता है।

इसके अतिरिक्त के0पी0 श्रीवास्तव की पुस्तक ‘मुगल फरमान’ से भी होता है। इसी पुस्तक में 1665 ई0 का एक फरमान संग्रहीत है जिसमें औरंगजेब ने पृथ्वीपतशाह की मृत्यु के बाद गद्दी पर बैठने के लिए पृथ्वीपत के पौत्र फतेशाह को बधाई दी गई है। अतः राजकुमार मेदनीशाह को गद्दी पर बैठने अवसर ही नहीं मिला।

फतेशाह –

पृथ्वीपतशाह की मृत्यु के बाद फतेशाह गढ़राज्य के शासक बने यद्यपि उनके सिहांसन पर बैठने की तिथि को लेकर मतैक्य नहीं है। हरिकृष्ण रतुड़ी और डॉ0 डबराल का मानना है कि वह 7 वर्ष की आयु में गद्दी पर बैठा एवं उसके व्यस्क होने तक उसकी माता ने संरक्षिका के रूप में सिहांसन किया। परन्तु पृथ्वीपतशाह के द्वारा अपने जीवनकाल में ही सत्ता सौंप देने का साक्ष्य इस तथ्य की सत्यता पर संदेह पैदा करता है क्योंकि कोई भी राजा जीवित रहते हुए अल्पव्यस्क को गद्दी नहीं सौंप सकता ।

इसके अतिरिक्त फतेहशाह का शिवाजी की भाँति घोड़े पर बैठा एक चित्र जिसके नीचे फतेशाह की आयु 33 वर्ष लिखी है। सम्भवतः फतेशाह ने अपने गद्दीनशीन के उपलक्ष्य में बनवाया होगा।

राजा फतेशाह के शासन काल के सम्वत् 1757, 1767 के दो ताम्रपत्र शूरवीर सिंह के संग्रह में प्राप्य है। इसके अतिरिक्त उसका एक सिक्का भी मिला है। इस सिक्के के दोनो भाग पर चित्र अंकित होने के साथ-साथ अपनी भाषा में लेख अंकित है जो उसके काल में गढराज्य की स्वंतत्र सत्ता का प्रमाण भी है।

फतेशाह का राज्य विस्तार –

फतेशाह गढ़राज्य के इतिहास में अपने वीरत्व एवं विजय अभियानों के लिए जाना जाता है। राहुल सांकृत्यायन के वर्णन के अनुसार उसकी विजय पताका तिब्बत तक फैली थी। उसके वीरत्व के सम्मान में उसकी तलवार एवं हथियार कई वर्षों तक ‘दाबा’ के विहार में रखे गये थे। सन् 1662 ई0 में फतेशाह ने सिरमौर रियासत पर आक्रमण किया एवं पॉवटासाहिब ओर जौनसार- भावर क्षेत्र को गढ़राज्य में सम्मिलित कर लिया था। देशराज की पुस्तक ‘सिख इतिहास के अनुसार सिरमौर का राजा गढराजा की शक्ति से इतना भयभीत हो गया था कि उसने सिक्ख गुरू गोविन्द सिंह से मदद की गुहार लगाई।

सम्भवतः फतेशाह के गुरू गोविन्द सिंह से अच्छी मित्रता थी फलतः उसने गुरूजी के कहने पर सिरमौर राज्य की मित्रता की याचना को स्वीकार कर लिया और उसकी उसके विजित क्षेत्रों को लौटाना स्वीकार कर लिया। यद्यपि कालान्तर में फतेहशाह और गुरू गोविन्द सिंह के सम्बन्ध कटु हो गये थे। सम्भवतः इसका कारण विलासपुर के शासक के पुत्र के साथ में फतेशाह की पुत्री का विवाह होना रहा होगा। विलासपुर के शासक की गुरूजी से शत्रुता थी फलतः भीमचन्द ने गढ़राज्य के फतेहशाह का गुरूजी से मित्रवत सम्बन्ध न रखने की चेतावनी दी हो और फतेशाह की पुत्री को त्याग देने की बात कही हो।

गुरू गाविन्द सिंह की आत्मकथा विचित्रनाटक में वर्णित है। कि पाँवटा से 6 मील की दूरी पर स्थित भैगणी नामक स्थल पर गढ़नरेश ओर सिक्ख केसरी के मध्य युद्ध हुआ था। हरिकृष्ण रतुड़ी के अनुसार इस युद्ध का अन्त शान्ति समझौते के रूप में हुआ था। जबकि विचित्र नाटक अनुसार फतेशाह को झुकना पड़ा। यद्यपि अपनी आत्मकथा में गुरूजी ने कही भी भीमचन्द का नाम उल्लेख नहीं किया है जिससे भैगणी युद्ध का कारण भीमचन्द तो नहीं लगता है।

अतः प्रतीत होता है कि गुरूजी फतेहशाह के काल में कुछ समय के लिए पाँवटा पधारे सम्भवतः यह उनकी निजी यात्रा रही हो अथवा सिरमौर नरेश मेदिनीप्रकाश के आग्रह पर वे यहाँ पधारे हों। पाँवटा विश्राम के दौरान गुरूजी शेरों का शिकार कर जब स्थानीय लोगों में प्रसिद्धि पाने लगे तो गढ़राज्य नरेश के लिए चिन्ता का विषय बनना स्वाभाविक था। फलतः दोनो के मध्य शत्रुता पनपने लगी और इसका ही परिणाम दोनों के मध्य युद्ध था।

फतेशाह ने सिरमौर राज्य को आंतकित ही नहीं किया बल्कि राज्य के कुछ हिस्से को अधिकृत भी कर लिया था। राजा फतेशाह की वीरता से कुर्माचल क्षेत्र भी प्रभावित हुआ था। भक्तदर्शन के अनुसार फतेहशाह ने कुमाऊँ पर आक्रमण किया। मैमायर्स ऑफ देहरादून में वर्णन है कि फतेशाह ने सहारनपुर पर भी आक्रमण किया और विजित क्षेत्र के इौरा परगने में ‘फतेहपुर’ नामक नगर बसाया।

अतः फतेहशाह पंवार वंश के वीर शासकों में से एक था। जिसकी वीरता की दुदंभी से आस-पास के राज्य आकांत थे। उसने गढ़राज्य की सीमाओं को विस्तृत किया।

फतेशाह केवल वीरता के लिए ही नहीं अपितु अपनी कलात्मक दृष्टि के लिए भी प्रसिद्ध था। माना जाता है कि चन्द्रगुत विक्रमादित्तय और मुगल सम्राट अकबर की भाँति फतेशाह का दरबार भी नवरत्नों से सुशोभित था। इन नवरत्नों में शामिल थे सुरेशानन्द बर्थवाल, खेतराम धस्माना, रूद्रीदत्त किमोठी, हरिदत्त नौटियाल, वासवानन्द बहुगुणा, शशिधर डगवाल, सहदेव चन्दोला, कीर्तिराम कनठौला, हरिदत्त थपलियाल ।

इस काल के कवियों, लेखकों ने फतेशाह की वीरता एवं विद्वता पर अनेक रचनाएँ लिखी है। जयशंकर द्वारा रचित ‘फतेहशाह कर्ण ग्रन्थ’ आज भी देवप्रयाग के पंडित चक्रधर शास्त्री की पुस्तकालय में रखा है। रतन कवि का हस्तलिखित ग्रन्थ ‘फतेहशाह’ शूरवीर सिंह के संग्रहालय में उपलब्ध है जिसका उन्होंने प्रकाशन भी करवाया है। तत्कालीन सुप्रसिद्ध विद्धान कविराज सुखदेव के ग्रन्थ ‘वृत विचार’ में भी फतेशाह का यशोगान है। हिन्दी जगत के कवि मतिराम की रचना ‘वृत कौमुदी में फतेहशाह की भूरि-भूरि प्रशंसा की गई है और उसकी तुलना छत्रपति शिवाजी से की है।

उपरोक्त वर्णन से स्पष्ट होता है कि फतेशाह ने अपनी योग्यता युद्धभूमि में ही नहीं बल्कि विद्धता के क्षेत्र में भी प्रदर्शित की है। अतः फतेशाह में वीरता एवं कलात्मकता का एक अनूठा सांमजस्य था।

राजा फतेहशाह अत्यन्त धार्मिक प्रवृत्ति का व्यक्ति था। नाथपंथ में उसकी अटूट श्रद्धा थी जिसका प्रमाण हमें 1668 ई0 के लिखे ताम्रपत्र से होता है जिसमें नाथपंथी संत बालकनाथ का वर्णन है जिसने हिमालयी क्षेत्र में प्रसिद्धि पाई।।

‘नाथपंथ’ के अनुयायी होने पर भी फतेहशाह धार्मिक रूप से सहिष्णु था। उसने सिक्खों के गुरूराम राय को अपने राज्य में आमंत्रित किया एवं देहरादून में गुरूद्वारे के निर्माण का न केवल स्वागत किया अपितु इसकी आय हेतु खुडबुड़ा, बाजपुर एवं चमासारी ग्राम दान में दिये। कालान्तर में फतेशाह के पौत्र प्रदीपशाह ने छायावाला, भजनवाला, पंडितवारी, तथा घाटावाला ग्राम गुरू रामराय जी को प्रदान किए। विलियम्स महोदय ने उपरोक्त वर्णन अपनी रचना में दिया है।

यद्यपि फतेशाह की मृत्यु की तिथि पर विद्वानो में मतैक्य नहीं है परन्तु शूरवीर सिंह के संग्रह में रखे ताम्रपत्र से 1715 ई० तक फतेहशाह के शासन करने का निश्चित प्रमाण मिलता है। दूसरा ताम्रपत्र 1716 ई0 का राजा प्रदीप शाह के काल का है। दोनों ताम्रपत्रों की तिथि के मध्य की 1 वर्ष 1 माह की अवधि पर मतभेद है।

भक्तदर्शन एवं वॉल्टन महोदय फतेहशाह के पश्चात् दिलीपशाह को गढ़नरेश मानते हैं जबकि मौलाराम के अनुसार उपेन्द्रशाह राजा फतेहशाह के उत्तराधिकारी थे। उनके द्वारा बनाया गया उपेन्द्रशाह का चित्र भी शूरवीर सिंह के संग्रहालय में उपलब्ध है। इन्हीं के संग्रह में उपलब्ध ‘बिन्दाकोर्ट का ताम्रपत्र भी इस बात की पुष्टि करता है कि ज्येष्ठ पुत्र होने के नाते उपेन्द्रशाह ही फतेहशाह के बाद गद्दी पर बैठे।

अतः उपलब्ध साक्ष्यों से यही स्पष्ट होता है कि 1715 ई0 किसी माह में फतेहशाह की मृत्यु हुई और उपेन्द्रशाह गद्दी पर बैठे। उपेन्द्रशाह अधिक दिन तक राजपाठ का सुख नहीं भोग पाये और उनके बाद प्रदीपशाह गद्दी पर बैठे।

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