वर्णमाला : वर्ण, उच्चारण और वर्तनी

 


वर्णमाला


भाषा के द्वारा मनुष्य अपने भाव-विचारों को दूसरे के समक्ष प्रकट करता है तथा दूसरों के भावो-विचारों को समझता है। आरम्भ में किसी बात को सुरक्षित रखने का एक ही साधन था – याद रखना। अपनी भाषा को सुरक्षित रखने, उसे नेत्रों के लिए दृश्यमान बनाए और भावी सन्तति के स्थान और काल की सीमा से निकाल कर अमर बनाने की ओर मनीषियों का ध्यान गया।

वर्षों बाद मनीषियों यहा अनुभव किया कि उनकी भाषा में जो ध्वनियाँ प्रयुक्त हो रहीं हैं, उनकी संख्या निश्चित है और इन ध्वनियों के योग से शब्दों का निर्माण हो सकता है। बाद में इनहि उच्चारित ध्वनियों के लिए लिपि से अलग-अलग चिन्ह बना लिए गए, जिन्हें वर्ण कहते हैं। इस प्रकार जिन ध्वनियों के संयोग से शब्द निर्माण होता है, वे वर्ण कहलाते हैं।भाषा कि सार्थक इकाई वाक्य है। वाक्य से छोटी इकाई उपवाक्य, उपवाक्य से छोटी इकाई पदबन्ध, पदबन्ध से छोटी इकाई अक्षर और अक्षर से छोटी इकाई ध्वनि या वर्ण है।

वर्ण

स्वर स्वतंत्र रूप से बोले जाने वाले वर्ण स्वर कहलाते हैं।

  1. मूल स्वर/ह्रस्व स्वर जिनके उच्चारण में कम समय (एक मात्रा का समय) लगता है। (अ, इ, उ)

  2. दीर्घ स्वर जिनके उच्चारण में ह्रस्व स्वर से अधिक समय (दो मात्र का समय) लगता है। (आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ)

  3. प्लुत स्वर जिनके उच्चारण में दीर्घ स्वर से भी अधिक समय लगता है; किसी को पुकारने में या नाटक के संवादों में इसका प्रयोग किया जाता है। (ओ३म, रा३म)

व्यंजन स्वरों की सहायता से बोले जाने वाले वर्ण व्यंजन कहलाते हैं।

 

  1. स्पर्श व्यंजन

जिन व्यंजनों का उच्चारण करते समय हवा फेफड़ों से निकलते हुए मुँह के किसी स्थान-विशेष कंठ, तालु, मूर्धा, दाँत या होठ का स्पर्श करते हुए निकले।

 

वर्गउच्चारण स्थानअघोष अल्पप्राणअघोष महाप्राणअल्पप्राण सघोष सघोष महाप्राणअल्पप्राण सघोष नासिक
‘क’ वर्गकण्ठ
‘च’ वर्गतालु
‘ट’ वर्गमूर्धा
‘त’ वर्गदन्त्य
‘प’ वर्गओष्ठ

 

  1. अन्तःस्थ व्यंजन – 

जिन वर्णो का उच्चारण पारंपरिक वर्णमाला के बीच अर्थात् स्वरों और व्यंजनों के बीच स्थित हो।

वर्गउच्चारण स्थान
य तालव्यतालु 

 

 

सघोष,अल्पप्राण

र वत्सर्यदंतमूल/मसूढ़ा
ल वत्सर्यदंतमूल/मसूढ़ा
व दंतोष्ठ्यऊपर के दाँत + निचला ओंठ

 

  1. ऊष्म/संघर्षी व्यंजन – 

जिन व्यंजनों का उच्चारण करते समय वायु मुख में किसी स्थान-विशेष पर घर्षण/रगड़ खा कर निकले और ऊष्मा/गर्मी पैदा करे।

वर्गउच्चारण स्थान
श तालव्यतालु 

सघोष,अल्पप्राण

ष मूर्धन्यमूर्धा
स वत्सर्यदंतमूल/मसूढ़ा
ह स्वरयंत्रीयस्वरयंत्र (कण्ठ के भीतर स्थित)सघोष,महाप्राण

 

आयोगवाह अं, अः

संयुक्त व्यंजन – 

जिन व्यंजनों के उच्चारण में अन्य व्यंजनों कि सहायता लेनी पड़ती है, संयुक्त व्यंजन कहलाते हैं :-

 

  • क् + ष = क्ष

  • त् + र = त्र

  • ज् + ञ = ज्ञ

  • श् + र = श्र

द्विगुणी/उत्क्षिप्त व्यंजन – 

जिन व्यंजनों के उच्चारण में जिह्वा की उल्टी हुई नोंक तालु को छूकर झटके से हट जाती है, उन्हे द्विगुणी/उत्क्षिप्त व्यंजन कहते हैं। ड़, ढ़ द्विगुणी/उत्क्षिप्त व्यंजन हैं।

 


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