उत्तराखण्ड का इतिहास (History Of Uttarakhand)- परमार वंश

उत्तराखण्ड का इतिहास – परमार वंश

उत्तराखण्ड का इतिहास – परमार वंश

परमार (पंवार) वंश

परमार वंश का संस्थापक कनकपाल को माना जाता है। इस तथ्य की पुष्टि श्री बैकेट द्वारा प्रस्तुत पंवार वंशावली एवं सभासार नामक ग्रन्थ से होती है। इसके अतिरिक्त परमार वंशावली कैप्टन हार्डविक, विलियम एवं एटकिन्सन महोदय ने भी दी है। एटकिन्सन ने अल्मोड़ा के किसी पण्डित के संग्रह से अपनी सूची ली है। इनमें श्री बैकेट की सूची सर्वाधिक प्रमाणिक प्रतीत होती है क्योंकि यह सुर्दशनशाह कृत ग्रन्थ “सभासार” (1828 ई0) से पूर्णतः मेल खाती है।

कनकपाल – 

कनकपाल को परमार (पंवार) वंश का संस्थापक माना जाता हैं कनकपाल मूलतः कहाँ का रहने वाला था इस विषय में इतिहासविदों के मध्य मतभेद है।

पण्डित हरिकृष्ण रतुड़ी का मानना है कि कनकपाल धारा नगरी से आये थे। एटकिन्सन महोदय ने रतुड़ी के मत का समर्थन करते हुए लिखा है कि धारानगरी के पंवार वंश का एक युवक इस पर्वतीय क्षेत्र की यात्रा को आया था। मार्ग में सोनपाल नाम के राजा का राज्य पड़ता था जिससे वह युवक मिलने जा पहुँचा। सोनपाल उस युवक से इतना प्रभावित हुआ कि अपनी कन्या का विवाह उस युवक से करवा दिया और दहेज में चाँदपुर परगना प्रदान किया। वॉल्टन भी एटकिन्सन के मत का ही सर्मथन करते हैं।

डॉ. पातीराम ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि “सम्वत् 756 में तत्कालीन राजवंश के कनकपाल मालवा से गढ़वाल आये। वे चन्दवंश के थे। इस पर्वतीय क्षेत्र में प्रचलित पुरातन नियम के अनुसार गढ़वाल के शासक सोनपाल ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित किया एवं अपनी पुत्री का विवाह कर दिया। सोनपाल केबाद कनकपाल सिहासनारूढ़ हुआ। सोनपाल गढ़राज्य की गढ़ियों में से किसी एक के गढ़पति होगें ।”

उपरोक्त मत पूर्णतः सत्य नहीं माने जा सकते है क्योंकि विद्वानों ने अपने मत के पक्ष में ठोस प्रमाण नहीं दिये। सम्भवतः इन लोगों ने कुछ साहित्यिक पंक्तियों के आधार पर ही अपना मत प्रस्तुत कर दिया।

जबकि चाँदपुर गढ़ी से प्राप्त एक शिलालेख पर अंकित लेख से प्रतीत होता है कि कनकपाल गुर्जर प्रदेश के किसी क्षेत्र से गढ़वाल आये थे। इसके अतिरिक्त एक अन्य महत्वपूर्ण प्रमाण भी यह प्रमाणित करता है कि गढ़वाल के पंवार वंश के आदि पुरूष मेवाड़, गुजरात, महाराष्ट्र से होकर गढ़वाल आये थे जिसे गुर्जर प्रदेश कहा जाता है। इसका प्रमाण है इस वंश के नरेशों के काल में बनी गणेश भगवान की मूर्ति अथवा चित्र है जिसमें उनकी सुंड दाहिनी ओर मुड़ी है। उदाहरणार्थ जोशीमठ से प्राप्त गणेश की नृत्यरत मूर्ति टिहरी के पुराना दरबार के राजप्रसाद के द्वार पर बनी काष्ठ की गणेश मूर्ति। गणेश की पूंड दाहिनी ओर मोड़ने की परम्परा पुरातन समय से गुजरात, राजस्थान एवं महाराष्ट्र में चली आ रही है जबकि उतर भारत में गणेश की पूंड बांयी ओर मुड़ी होती है।

गुर्जर प्रदेश से कनकपाल के आने का एक अन्य प्रमाण ‘आदिबद्री’ मन्दिर भी है जिसकी रचना गुजरात एवं राजस्थान के सोलंकी मन्दिर निर्माण शैली से मिलती है। इसके अतिरिक्त एक विशेष तथ्य यह भी है कि गढ़वाल एवं कुमाऊँ की अनेक राजपूत जातियाँ अपना मूल स्थान गुर्जर प्रदेश को ही बताती है। रूद्रसिंह तोमर एवं बालकृष्ण शास्त्री बताते है कि कनकपाल के साथ गोर्खा रावत, बत्र्वाल, रौतेला तथा बाग्ली नेगी भी गढ़वाल आए थे।

डॉ. शूरबीर सिंह के संग्रह के रखे कुछ ऐसे पत्र है जो भी कनकपाल के धारानगरी से आने के भ्रम को मिटा देते है। उदाहरणार्थ सन् 1927 दीवान चक्रधर जुयाल 23 मई पत्रांक 560/सी, भेजने की तिथि 13 जून 1927, इण्डोर्स-मेंण्ट न0 1839502-27 को धारा दरबार भेजा था जिसका प्रति उत्तर दिनांक 10 दिसम्बर 1927 को पत्र सं0 1004 धार के इतिहास अधिकारी ने पत्र सं0 17 दिनांक 22 जुलाई 1927 को टिहरी भेजा था जिसमें स्पष्ट शब्दों में पुष्टि की गई थी कि कनकपाल का धारानगरी के राजवंश से कोई सम्बन्ध नहीं था।

इस प्रकार कनकपाल को गुर्जर प्रदेश से आने की बात सर्वाधिक प्रमाणिक प्रतीत होती हैं। श्री कन्हैयालाल कणिकलाल मुंशी रचित “दि ग्लोरी दैट वाज गूजर देश में राजस्थान, महाराष्ट्र, मालवा एवं गुजरात के सम्मिलित क्षेत्र को गुर्जर प्रदेश कहा है।

वर्ण–निर्धारण –

गढ़वाल में पंवार वंश के संस्थापक कनकपाल का सम्बन्ध परमार वंश से ही था या नहीं, इस सम्बन्ध में सर्वप्रथम साक्ष्य इस वंश के नरेश सुदर्शनशाह द्वारा रचित ग्रन्थ ” सभासार” की यह पंक्ति है कि “मानी पंवार कुछ वंश की देत जो पुश्त बदरी वंशत से स्पष्ट होता है कि कनकपाल परमार वंश के ही थे। | गढराज्य में भाटों रचित गीत ‘पवाड़ा’ या “पैवाड़ा” कहलाते है। श्याम परमार ने अपनी रचना ‘भारतीय लोक साहित्य में लिखा है कि परमार वंश के लोग चाहे बिहार में बसे हों या भारत के किसी अन्य भाग में उन लोगो में ‘पैवड़ा’ शब्द अत्यधिक प्रचलित है।

बृज व भोजपुरी भाषा में ‘पवाड़ा’ मध्य प्रदेश एवं उतर प्रदेश में ‘पंवारा’ तथा महाराष्ट्र में ‘पवाड़े’ या पंवाड़’ बहुत प्रयोग होता है। डॉ0 सत्येन्द्र लिखते है कि इन गीतों से पहले पंवार क्षत्रियों की गाथायें गाई जाती होगी, फलतः परमारों के गीत होने के कारण ये ‘पमारे’ कहलाए ।

अतः गढ़वाल क्षेत्र में ‘पंवाड़’ शब्द परमारों ने ही प्रचलित किया होगा। गढ़वाल की कतिपय वीरगाथाएँ (पंवाडे) जैसे कफ्फूचौहान पंवाड़ा, विजयपाल पवाड़ा, जीतु–बगड़वाल पंवाड़ा, रिखोला लोदी, तीलू रौतेली एवं माधोसिंह पवाड़ा अत्यधिक लोकप्रिय है।

भक्तदर्शन ने अपनी पुस्तक” गढ़वाल की दिवंगत विभूतियों में गढ़वाल नरेशों को परमार वंश का ही माना है। राजपूतों की उत्पति सम्बन्धी पृथ्वीराज रासो’ के अनुसार अग्निकुण्ड से चार राजपूत कुलों का उद्भव हुआ – परमार, प्रतिहार, चौहान तथा चालुक्य और यहीं पर आबू पर्वत की तलहटी में चन्द्रपुरी नाम का नगर था। अतः गढ़वाल आकर कनकपाल ने चन्द्रपुरी की सुखद स्मृतियों को सजीव रखने के लिए अपने गढ़ का नाम “चाँदपुरगढी’ रखा होगा।

इसके अतिरिक्त मॉउण्टआबू और गढ़वाल में अन्य समानताएँ भी पाई जाती हैं। उदाहरणार्थ उत्तरकाशी जिले का गोमुख और आबू पर्वत के गोमुख की बनावट एक सी है। आबू के पास एक स्थल ‘कोटेश्वर’ है तो पुरानी टिहरी के निकट भी इसी नाम का स्थल है जहाँ वर्तमान में कोटेश्वर विद्युत परियोजना निर्माणाधीन है। आबू पर्वत पर एक पवित्र कुण्ड “मन्दाकिनी’ है। जिसे शान्तमूर्ति मुनिराज की पुस्तक “आबू में परमार नरेश द्वारा निर्मित बताया गया है। इसी नाम की नदी चमोली जिले में गंगा की सहायक नदी है। अतः गढ़वाल एवं आबू क्षेत्र में प्रचलित समान नामावली भी इस ओर संकेत करती है कि परमारों का इन दोनो स्थलों से गहरा सम्बन्ध था।

प्रारम्भिक जीवन –

पंवार वंश के सस्थापक राजा कनकपाल का मूल निवास गुर्जर प्रदेश था। यह उपरोक्त वर्णन से सिद्ध होता है। उनके सिंहासनरूढ़ होने की तिथि पर भी मतैक्य नहीं है। उनके सिंहासन पर बैठने की तिथि के सम्बन्ध में प्रचलित मत इस प्रकार हैं

पंडित हरिकृष्ण रतुड़ी ने अपनी पुस्तक ‘गढ़वाल के इतिहास में एक स्थान पर कनकपाल के 888 ई0 में गद्दी पर बैठने का वर्णन किया है जबकि अपनी दूसरी रचना ” गढ़वाल वर्णन” में अपने मत का खण्डन करते हुए उन्होंने उसके सिंहासनरूढ होने की तिथि सम्वत् 745 (688 ई0) बताई है।

भक्त दर्शन ने राजा कनकपाल के सिंहासनारूढ़ होने की तिथि 888 ई0 ही बताई है।

डॉ0 शिवप्रसाद डबराल ने कोई निश्चित तिथि नहीं लिखी है उन्होंने अलग-अलग विद्वानों के मतों का उल्लेख किया हैं। चाँदपुरगढी दुर्ग निर्माण उनके अनुसार सन् 1425 से 1500 ई0 के मध्य हुआ जिस आधार पर राजा कनकपाल के सिंहासनरूढ़ होने की तिथि 15वीं शताब्दी के आरम्भ बैठती है।

राहुल सांकृत्यायन ने तो राजा कनकपाल के राजा होने पर भी संदेह व्यक्त किया है। वे तो अजयपाल को (1500 ई0) पंवार वंश का संस्थापक मानते हैं।

श्री बैकट ने अपनी सूची में सम्वत् 756 में राजा कनकपाल के 11 वर्ष के शासन का अन्त माना है। अर्थात् राजा कनकपाल उनके अनुसार सम्वत् 754 (756-11) में गद्दी पर बैठे थे। यह तिथि ईसवी सन् 688 बैठती है।

बालकृष्ण शान्ती भट्ट ने अपनी पुस्तक ‘गढ़वाल जाति प्रकाश में जो पक्तियाँ प्रस्तुत की हैं उनके अनुसार राजा कनकपाल सम्वत् 745 (अर्थात् 688 ई0) में गढ़वाल आए और राजा बने।

इसके अतिरिक्त शूरबीर सिंह के ऐतिहासिक संग्रह में कवि देवराज की लिखी गढ़वाल राजा वंशावली’ की हस्तलिखित पाण्डुलिपि रखी हैं जिसमें स्पष्टतः राजा कनकपाल के गढ़वाल आने और सिहांसनरूढ़ होने की तिथि 745 सम्वत् अर्थात 688 ई० लिखी

अतः उपरोक्त विवरण से राजा कनकपाल के गढ़वाल क्षेत्र में आने और राजा बनने की सर्वाधिक प्रमाणित तिथि सम्वत् 745 (688 ई0) ही प्रतीत होती है।

राजा अजयपाल –

अजयपाल श्री बैकेट की पंवार वंशावली के अनुसार वंश का 27वाँ राजा था। इससे पूर्व के पंवार राजाओं की जानकारी के ऐतिहासिक स्त्रोत उपलब्ध न होने कारण इस बीच के इतिहास का प्रमाणिक ज्ञान न के बराबर है। इसे पंवार राजवंश के इतिहास का “अंधकार युग’ की संज्ञा दी जा सकती है।

राजा अजयपाल के शासनकाल में पंवार राजाओं ने पहली बार अपनी राजधानी परिवर्तन की और श्रीनगर (गढ़वाल) को चाँदपुर-गढ़ी के स्थान पर नवीन राजधानी बनाया। इसके अतिरिक्त राजा अजयपाल को गढ़वाल क्षेत्र की 52गढ़ियों (ठकुराईयों)को विजित कर एक विशाल गढ़राज्य की स्थापना का श्रेय दिया जाता है जिसे ” गढवाल राज्य के नाम से जाना जाता है। यद्यपि गढ़वाल क्षेत्र में गढ़ियों की संख्या को लेकर मतभेद हैं। इतिहासकारों के अनुसार –

  • कनकपाल ने 12 गढ़ों को अधीन किया था।

  • हरिकृष्ण रतुड़ी के अनुसार इन बावन गढ़ों में ठाकुरी राज्य था। अतः इन्हें ठकुराईयाँ कहा जाता रहा होगा। हरिकृष्ण रतुड़ी ने प्रारम्भ में 64 परगनों के आधार पर 64 गढों का अनुमान किया।

  • डॉ. यशवन्त कटौच चाँदपुरगढ़ी से प्राप्त सूची के आधार पर 24 गढ़ों का उल्लेख लेख में करते हैं।

  • वाचस्पति गैरोला अजयपाल से पहले से ही गढ़वाल को 52 गाड़ियों में विभक्त मानते है।

  • गढ़वाल क्षेत्र में प्रचलित जागर गाथाओं में भी 52 नरसिंगों की गढ़ो में नियुक्ति का प्रसंग आता है जिससे भी 52 गढ होने की पुष्टि होती है।

  • डॉo शिवानन्द नौन्त्यिाल जागरों में आये इन 52 वीरों के नामों को 52 गढ़ों का नाम मानते हैं। कुछ विद्वानों ने ‘शिवबावनी’को गढ़वाली माना है ।

नरसिंह देव के शासनकाल में शासन व्यवस्था में 52 नरसिंहों की भूमिका महत्वपूर्ण होती थी। अतः ये 52 स्थान इन वीरों के नाम से प्रचिलित हो गए। इनके साथ ही 85 भैरव भी जागर में आते हैं। सम्भवतः ये भैरव 85 भिन्न-भिन्न स्थानों (उपगढ़ों) में नरसिंगों के अधीन गिरद्वार–घाटों की रक्षा के लिए नियुक्त थे।

1050 ई0 के आस-पास नरसिंह देव के द्वारा 52 नरसिंगो की नियुक्ति की गई मानी जाती है। रायबहादुर पातीराम ने समस्त गढ़ों को जीतने वाले राजा अजयपाल को ‘गढपाल’ कहकर सम्बोधित किया। अभिलेखीय साक्ष्यों में हमें रानी कर्णावती के काल का ताम्रपत्र जिस पर सम्वत् 1640 अंकित हैं और यह हाट गांव से प्राप्त हुआ है। इस ताम्रपत्र में सर्वप्रथम “गढ़वाल सन्तान’ उत्कीर्ण है। इसके अतिरिक्त बद्रीदत्त पांडे के अनुसार दीपचन्द के ताम्रपत्र (1600 ई0) में भी गढ़वाल के राजा प्रतीपशाह का उल्लेख हुआ है। अतः इससे स्पष्ट होता है “गढवाल” शब्द 15वीं शताब्दी के बाद ही प्रयोग होने लगा।

कौटिल्य द्वारा वर्णित तीन प्रकार के दुर्ग यथा जलदुर्ग, मरूस्थलीय दुर्ग और पर्वत दुर्ग में वर्णित पर्वत दुर्ग के समान ही उत्तराखण्ड के गढ़ थे। इन पर कठिनाई से चढ़ा जा सकता था और इनसे निकलने के लिए एक गुप्त सुरंग होती थी। जौनसार-भावर क्षेत्र में इन दुर्गों को ‘टिम्बा’ कहा जाता है। अग्निपुराण में वर्णन है कि गढ़ दुर्गों में गढपति अपने परिवार और विश्वासपात्रों के साथ रहकर आस-पास की उपत्यका पर शासन करता था। गढ़ ही उसका पुर होता था जहाँ घाट, मन्दिर इत्यादि सभी होता था।

गढ़ के अतिरिक्त कोट, बूंगा, थुम्बा, मौड़ा आदि भी गढ़ के छोटे रूप अथवा गढ़ से छोटी ईकाइयाँ होती थी। मुस्लिम काल के लेखको ने इन कोटों की अधिसंख्य के कारण ही गढ़वाल के प्रवेश द्वारों को कोटद्वार, हरिद्वार नाम दिया। गढ़ के भीतर घेराबन्दी के समय के लिए पर्याप्त भोजन व्यवस्था रखी जाती थी तथा पानी के लिए पहाड़ी के शीर्ष से जल स्त्रोत तक गुप्त सुरंग बनाई जाती थी। चाँदपुरगढ़ी, खैरागढ़, उप्पूगढ़ गुजडुगढी,भैरवगढी इत्यादि में सुरंग अब भी दृष्टव्य है।

इन गढ़ो पर जगह-जगह खाई काटी जाती थी। जहाँ शत्रु पर वार करने के लिए बड़े-बड़े पत्थर एकत्रित रखे जाते थे। इसी कारण महाभारत में पहाड़ी लोगों को पाषाणयोधीन तथा अश्मकयुद्ध विशारद कहा गया है। सम्भवतः मुहमद बिन तुगलक के कराचल अभियान जिसकी साम्यता कुछ विद्वान गढ़वाल राज्य से करते हैं। इसमें तुगलक की एक लाख सैनिक बिना युद्ध किये इन्ही पाषाण योद्धाओं के द्वारा मारी गयी। इनके अनुसार केवल तीन अफसर जीवित दिल्ली पहुंचे।

अतः इन गढ़ों के मान्य संख्या कुछ भी हो परन्तु इनकी बहुलता के कारण ही यह क्षेत्र गढ़वाल कहलाया। यद्यपि वर्तमान समय में सभी गढ़ी नष्टप्रायः है। इन गाड़ियों के अवशेष ही यत्र-तत्र बिखरे पड़े मिलते हैं ?

अजयपाल पंवार वंश का महानतम शासक था। कवि भरत कृत ‘मानोदय’ (ज्ञानोदय) में उसकी तुलना कृष्णा, कुबेर, युधिष्ठर, भीम एवं इन्द्र से की गई है। वर्तमान श्रीनगर गढ़वाल से आठ या नौ किलोमीटर की दूरी पर एक छोटी-सी पहाड़ी पर बसा देवलगढ़ अजयपाल की राजधानी थी। यहाँ उसने एक राजप्रसाद एवं अपनी कुलदेवी ‘राज-राजेश्वरी’ का मन्दिर बनवाया। सम्भवतः यह स्थल गोरखपंथी संत ” सतनाथ” का आश्रम भी था। राजा अजयपाल इस पंथ का अनुयायी था क्योंकि उसे गोरखपंथी सम्प्रदाय के अनुयायी भृतहरि एवं गोपीचन्द्र की श्रेणी में रखा जाता है।

जार्ज डब्लू व्रिग्स ने तो अजयपाल को गोरखनाथ सम्प्रदाय के एक पंथ का संस्थापक भी माना है। “नवनाथ कथा” तथा “गोरक्षा स्तवांजलि’ ग्रन्थ में तो अजयपाल को गोरखपंथी सम्प्रदाय के 84 सिद्धों में से एक सिद्ध माना है।

प्रो0 अजय सिंह रावत ने अजयपाल की तुलना महान मौर्य सम्राट अशोक से की है। उनके अनुसार जिस प्रकार कंलिग युद्ध (261बी.सी) के भीषण नरसंहार से क्षुब्द होकर अशोक ने ” भेरीघोष” को त्यागकर ‘धम्मघोष- को अपना लक्ष्य निर्धारित किया था। उसी प्रकार अजयपाल ने गढ़वाल क्षेत्र की सभी 52 गढ़ियों को जीतने के बाद सदैव के लिए ऐश्वर्य को त्यागकर गुरूपन्थ को अपना लिया।

दूसरे शब्दों में अजयपाल ने भी सम्राट अशोक की ही भाँति गढ़राज में अपनी सार्वभौमिकता स्थापित करने के बाद अपना सम्पूर्ण जीवन गोरखपंथी सम्प्रदाय के विकास पर लगा दिया था। शूरवीर सिंह के संग्रह में रखी तांत्रिक विधा की पुस्तक ‘सांवरी ग्रन्थ’ की हस्तलिखित प्रति में अजयपाल को ‘आदिनाथ’ कहकर सम्बोधित किया गया है। यह अजयपाल के गोरखपंथ में उच्च स्थान का द्योतक है। देवलगढ़ के विष्णु मन्दिर के दाहिनी ओर ठीक सामने की दीवार पर अजयपाल को पदमासन मुद्रा में चित्रित किया गया है। इस चित्र में उनके कानों में कुण्डल एवं सिर पर पगड़ी है।

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